|
रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (उत्तरकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (उत्तरकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
|
|
||||||
भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। सप्तम सोपान उत्तरकाण्ड
दो.-जो नहिं देखा नहिं सुना जो मनहूँ न समाइ।
सो सब अद्भुत देखेउँ बरनि कवनि बिधि जाइ।।80क।।
सो सब अद्भुत देखेउँ बरनि कवनि बिधि जाइ।।80क।।
जो कभी न देखा था, न सुना था और जो मन में भी नहीं समा सकता
था (अर्थात् जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी), वही सभी अद्भुत सृष्टि
मैंने देखी। तब उनका किस प्रकार वर्णन किया जाय!।।80(क)।।
एक एक ब्रह्मांड महुँ रहउँ बरष सत एक।
एहि बिधि देखत फिरउँ मैं अंड कटाह अनेक।।80ख।।
एहि बिधि देखत फिरउँ मैं अंड कटाह अनेक।।80ख।।
मैं एक-एक ब्रह्माण्ड में एक-एक सौ वर्षतक रहता। इस प्रकार
मैं अनेकों ब्रह्माण्ड देखता फिरा।।80(ख)।।
चौ.-लोक लोक प्रति भिन्न बिधाता। भिन्न बिष्नु सिव मनु
दिसित्राता।।
नर गंधर्ब भूत बेताला। किंनर निसिचर पसु खग ब्याला।।1।।
नर गंधर्ब भूत बेताला। किंनर निसिचर पसु खग ब्याला।।1।।
प्रत्येक लोक में भिन्न-भिन्न ब्रह्मा, भिन्न-भिन्न बिष्णु,
शिव, मनु, दिक्पाल, मनुष्य गन्धर्व, भूत, वैताल, किन्नर, राक्षस, पशु,
पक्षी, सर्प।।1।।
देव दनुज गन नाना जाती। सकल जीव तहँ आनहि भाँती।।
महि सरि सागर सर गिरि नाना। सब प्रपंच तहँ आनइ आना।।2।।
महि सरि सागर सर गिरि नाना। सब प्रपंच तहँ आनइ आना।।2।।
तथा नाना जाति के देवता एवं दैत्यगण थे। सभी जीव वहाँ दूसरे
ही प्रकार के थे। अनेक पृथ्वी, नदी, समुद्र, तालाब, पर्वत तथा सब सृष्टि
वहाँ दूसरी-ही-दूसरी प्रकार की थी।।2।।
अंडकोस प्रति प्रति निज रूपा। देखेउँ जिनस अनेक अनूपा।।
अवधपुरी प्रति भुवन निनारी। सरजू भिन्न भिन्न नर नारी।।3।।
अवधपुरी प्रति भुवन निनारी। सरजू भिन्न भिन्न नर नारी।।3।।
प्रत्येक ब्रह्माण्ड-ब्रह्माण्ड में मैंने अपना रूप देखा तथा
अनेकों अनुपम वस्तुएँ देखीं। प्रत्येक भुवन में न्यारी ही अवधपुरी, भिन्न
ही सरयूजी और भिन्न प्रकार के नर-नारी थे।।3।।
दसरथ कौसल्या सुनु ताता। बिबिध रूप भरतादिक भ्राता।।
प्रति ब्रह्मांड राम अवतारा। देखउँ बालबिनोद अपारा।।4।।
प्रति ब्रह्मांड राम अवतारा। देखउँ बालबिनोद अपारा।।4।।
हे तात! सुनिये, दशरथजी, कौसल्याजी और भरतजी आदि भाई भी
भिन्न-भिन्न रूपोंके थे। मैंने प्रत्येक ब्रहाण्डमें रामावतार और उनकी अपार
बाललीलाएँ देखता फिरता।।4।।
दो.-भिन्न भिन्न मैं दीख सबु अति बिचित्र हरिजान।।
अगनित भुवन फिरेउँ प्रभु राम न देखेउँ आन।।81क।।
अगनित भुवन फिरेउँ प्रभु राम न देखेउँ आन।।81क।।
हे हरिवाहन! मैंने सभी कुछ भिन्न-भिन्न और अत्यन्त विचित्र
देखा। मैं अनगिनत ब्रह्माण्डोंमें फिरा, पर प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको मैंने
दूसरी तरह का नहीं देखा।।81(क)।।
सोइ सिसुपन सोइ सोभा सोइ कृपाल रघुबीर।
भुवन भुवन देखत फिरउँ प्रेरित मोह समीर।।81ख।।
भुवन भुवन देखत फिरउँ प्रेरित मोह समीर।।81ख।।
सर्वत्र वही शिशुपन, वही शोभा और वही कृपालु श्रीरघुवीर! इस
प्रकार मोह रूपी पवन प्रेरणा से मैं भुवन-भुवन में देखता-फिरता था।।81(ख)।।
चौ.-भ्रमत मोहि ब्रह्मांड अनेका। बीते मनहुँ कल्प सत
एका।।
फिरत फिरत निज आश्रम आयउँ। तहँ पुनि रहि कछु काल गवाँयउँ।।1।।
फिरत फिरत निज आश्रम आयउँ। तहँ पुनि रहि कछु काल गवाँयउँ।।1।।
अनेक ब्रह्माण्डों में भटकते हुए मानो एक सौ कल्प बीत गये
फिरता-फिरता मैं अपने आश्रम में आया और कुछ काल वहाँ रहकर बिताया।।1।।
निज प्रभु जन्म अवध सुनि पायउँ। निर्भर प्रेम हरषि उठि
धायउँ।।
देखउँ जन्म महोत्सव जाई। जेहि बिधि प्रथम कहा मैं गाई।।2।
देखउँ जन्म महोत्सव जाई। जेहि बिधि प्रथम कहा मैं गाई।।2।
फिर जब अपने प्रभु का अवधपुरी में जन्म (अवतार) सुन पाया, तब
प्रेम से परिपूर्ण होकर मैं हर्षपूर्वक उठ दौड़ा। जाकर मैंने जन्म-महोत्सव
देखा, जिस प्रकार मैं पहले वर्णन कर चुका हूँ।।2।।
राम उदर देखेउँ जग नाना। देखत बनइ न जाइ बखाना।।
तहँ पुनि देखेउँ राम सुजाना। माया पति कृपाल भगवाना।।3।।
तहँ पुनि देखेउँ राम सुजाना। माया पति कृपाल भगवाना।।3।।
श्रीरामचन्द्रजी के पेट में मैंने बहुत-से जगत् देखे, जो
देखते ही बनते थे, वर्णन नहीं किये जा सकते। वहाँ फिर मैंने सुजान मायाके
स्वामी कृपालु भगवान् श्रीरामजी को देखा।।3।।
करउँ बिचार बहोरि बहोरी। मोह कलिल ब्यापित मति मोरी।।
उभय घरी महँ मैं सब देखा। भयउँ भ्रमित मन मोह बिसेषा।।4।।
उभय घरी महँ मैं सब देखा। भयउँ भ्रमित मन मोह बिसेषा।।4।।
मैं बार-बार विचार करता था। मेरी बुद्धि मोह रूपी कीचड़ से
व्याप्त थी। यह सब मैंने दो ही घड़ीमें देखा। मनमें विशेष मोह होने से मैं
भ्रमित हो गया था।।4।।
दो.-देखि कृपाल बिकल मोहि बिहँसे तब रघुबीर।
बिहँसतहीं मुख बाहेर आयउँ सुनु मतिधीर।।82क।।
बिहँसतहीं मुख बाहेर आयउँ सुनु मतिधीर।।82क।।
मुझे व्याकुल देखकर तब कृपालु श्रीरघुवीर हँस दिये। हे
धीरबुद्धि गरुड़जी! सुनिये, उनके हँसते ही मैं मुँहसे बाहर आ गया।।82(क)।।
सोइ लरिकाई मो सन करन लगे पुनि राम।।
कोटि भाँति समुझावउँ मनु न लहइ बिश्राम।।82ख।।
कोटि भाँति समुझावउँ मनु न लहइ बिश्राम।।82ख।।
श्रीरामचन्द्रजी मेरे साथ फिर वही लड़कपन करने लगे। मैं
करोड़ों (असंख्य) प्रकारसे मन को समझाता था, पर वह शान्ति नहीं पाता
था।।82(ख)।।
चौ.-देखि चरित यह सो प्रभुताई। समुझत देह दसा बिसराई।।
धरनि परेउँ मुख आव न बाता। त्राहि त्राहि आरत जन त्राता।।1।।
धरनि परेउँ मुख आव न बाता। त्राहि त्राहि आरत जन त्राता।।1।।
यह [बाल] चरित्र देखकर और [पेटके अंदर देखी हुई] उस प्रभुता
का स्मरण कर शरीरकी सुध भूल गया और ‘हे आर्तजनोंके रक्षक! रक्षा कीजिये,
रक्षा कीजिये, पुकारता हुआ पृथ्वी पर गिर पड़ा। मुख से बात नहीं निकलती
थी!।।1।
प्रेमाकुल प्रभु मोहि बिलोकी। निज माया प्रभुता तब रोकी।।
कर सरोज प्रभु मम सिर धरेऊ। दीनदयाल सकल दुख हरेऊ।।2।।
कर सरोज प्रभु मम सिर धरेऊ। दीनदयाल सकल दुख हरेऊ।।2।।
तदनन्तर प्रभुने मुझे प्रेमविह्वल देखकर अपनी मायाकी प्रभुता
(प्रभाव) को रोक लिया। प्रभुने अपना कर-कमल मेरे सिर पर रक्खा। दीनदयालु ने
मेरा सम्पूर्ण दुःख हर लिया।।2।।
कीन्ह राम मोहि बिगत बिमोहा। सेवक सुखद कृपा संदोहा।।
प्रभुता प्रथम बिचारि बिचारी। मन महँ होइ हरष अति भारी।।3।।
प्रभुता प्रथम बिचारि बिचारी। मन महँ होइ हरष अति भारी।।3।।
सेवकों को सुख देने वाले, कृपा के समूह (कृपामय) श्रीरामजीने
मुझे मोह से सर्वथा रहित कर दिया। उनकी पहले वाली प्रभुता को विचार-विचारकर
(याद कर-करके) मेरे मन में बड़ा भारी हर्ष हुआ।।3।।
भगत बछलता प्रभु कै देखी। उपजी मम उर प्रीति बिसेषी।।
सजल नयन पुलकित कर जोरी। कीन्हिउँ बहु बिधि बिनय बिहोरी।।4।।
सजल नयन पुलकित कर जोरी। कीन्हिउँ बहु बिधि बिनय बिहोरी।।4।।
प्रभु की भक्तवत्सलता देखकर मेरे हृदय में बहुत ही प्रेम
उत्पन्न हुआ। फिर मैंने [आनन्दसे] नेत्रों जल भरकर, पुलकित होकर और हाथ
जोड़कर बहुत प्रकार से विनती की।।4।।
दो.-सुनि सप्रेम मम बानी देखि दीन निज दास।
बचन सुखद गंभीर मृदु बोले रमानिवास।।83क।।
बचन सुखद गंभीर मृदु बोले रमानिवास।।83क।।
मेरी प्रेमयुक्त वाणी सुनकर और अपने दासको दीन देखकर रमानिवास
श्रीरामजी सुखदायक गम्भीर और कोमल वचन बोले-।।83(क)।।
काकभसुंडि मागु बर अति प्रसन्न मोहि जानि।
अनिमादिक सिधि अपर रिधि मोच्छ सकल सुख खानि।।83ख।।
अनिमादिक सिधि अपर रिधि मोच्छ सकल सुख खानि।।83ख।।
हे काकभुशुण्डि! तू मुझे अत्यन्त प्रसन्न जानकर वर माँग।
अणिमा आदि अष्ट सिद्धियाँ, दूसरी ऋद्धियाँ तथा सम्पूर्ण सुखों की खान
मोक्ष।।83(ख)।।
चौ.-ग्यान बिबेक बिरति बिग्याना। मुनि दुर्लभ गुन जे जग
नाना।।
आजु देउँ सब संसय नाहीं। मागु जो तोहि भाव मन माहीं।।1।।
आजु देउँ सब संसय नाहीं। मागु जो तोहि भाव मन माहीं।।1।।
ज्ञान, विवेक, वैराग्य, विज्ञान, (तत्त्वज्ञान) और वे अनेकों
गुण जो जगत् में मुनियों के लिये भी दुर्लभ हैं, ये सब मैं आज तुझे दूँगा,
इसमें सन्देह नहीं। जो तेरे मन भावे, सो माँग ले।।1।।
सुनि प्रभु बचन अधिक अनुरागेउँ। मन अनुमान करन तब
लागेउँ।।
प्रभु कह देन सकल सुख सही। भगति आपनी देन न कही।।2।।
प्रभु कह देन सकल सुख सही। भगति आपनी देन न कही।।2।।
प्रभु के वचन सुनकर मैं बहुत ही प्रेममें भर गया। तब मन में
अनुमान करने लगा कि प्रभुने सब सुखों के देनेकी बात कही, यह तो सत्य है; पर
अपनी भक्ति देने की बात नहीं कही।।2।।
भगति हीन गुन सब सुख ऐसे। लवन बिना बहु बिंजन जैसे।।
भजन हीन सुख कवने काजा। अस बिचारि बोलेउँ खगराजा।।3।।
भजन हीन सुख कवने काजा। अस बिचारि बोलेउँ खगराजा।।3।।
भक्तिसे रहित सब गुण और सब सुख वैसे ही (फीके) हैं, जैसे
नमकके बिना बहुत प्रकारके भोजन के पदार्थ! भजन से रहित सुख किस काम के? हे
पक्षिराज! ऐसा विचारकर मैं बोला-।।3।।
जौं प्रभु होइ प्रसन्न बर देहू। मो पर करहु कृपा अरु
नेहू।।
मन भावत बर मागउँ स्वामी। तुम्ह उदार उर अंतरजामी।।4।।
मन भावत बर मागउँ स्वामी। तुम्ह उदार उर अंतरजामी।।4।।
हे प्रभो! यदि आप प्रसन्न होकर मुझे वर देते हैं और मुझपर
कृपा और स्नेह करते हैं, तो हे स्वामी! मैं अपना मन-भाया वर माँगता हूँ। आप
उदार हैं और हृदय के भीतरकी जाननेवाले हैं।।4।।
दो.-अबिरल भगति बिसुद्ध तव श्रुति पुरान जो गाव।
जेहि खोजत जोगीस मुनि प्रभु प्रसाद कोउ पाव।।84क।।
जेहि खोजत जोगीस मुनि प्रभु प्रसाद कोउ पाव।।84क।।
आपकी जिस अविरल (प्रगाढ़) एवं विशुद्ध (अनन्य निष्काम)
भक्तिको श्रुति और पुराण गाते हैं, जिसे योगीश्वर मुनि खोते हैं और प्रभु
की कृपा से कोई विरला ही जिसे पाता है।।84(क)।।
भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपा सिंधु सुख धाम।
सोइ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम।।84ख।।
सोइ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम।।84ख।।
हे भक्तोंके [मन-इच्छित फल देनेवाले] कल्पवृक्ष! हे शरणागतके
हितकारी! हे कृपा सागर। हे सुखधाम श्रीरामजी! दया करके मुझे अपनी वही भक्ति
दीजिये ।।84(ख)।।
चौ.-एवमस्तु कहि रघुकुलनायक। बोले बचन परम सुखदायक।।
सुनु बायस तैं सहज सयाना। काहे न मागसि अस बरदाना।।1।।
सुनु बायस तैं सहज सयाना। काहे न मागसि अस बरदाना।।1।।
‘एवमस्तु’ (ऐसा ही हो) कहकर रघुकुल के स्वामी परम सुख
देनेवाले वचन बोले-हे काक! सुन, तू स्वाभव से ही बुद्धिमान् है। ऐसा वरदान
कैसे न माँगता?।।1।।
सब सुख खानि भगति तैं मागी। नहिं जग कोउ तोहि सम
बड़भागी।।
जो मुनि कोटि जतन नहिं लहहीं। जे जप जोग अनल तन दहहीं।।2।।
जो मुनि कोटि जतन नहिं लहहीं। जे जप जोग अनल तन दहहीं।।2।।
तूने सब सुखों की खान भक्ति माँग ली, जगत् में तेरे समान
बड़भागी कोई नहीं है। वे मुनि जो जप और योगकी अग्निसे शरीर जलाते रहते हैं,
करोड़ों यत्न करके भी जिसको (जिस भक्तिको नहीं) पाते।।2।।
रीझेउँ देखि तोरि चतुराई। मागेहु भगति मोहि अति भाई।।
सुनु बिहंग प्रसाद अब मोरें।। सब सुभ गुन बसिहहिं उर तोरें।।3।।
सुनु बिहंग प्रसाद अब मोरें।। सब सुभ गुन बसिहहिं उर तोरें।।3।।
वही भक्ति तूने माँगी। तेरी चतुरता देखकर मैं रीझ गया। यह
चतुरता मुझे बहुत अच्छी लगी। हे पक्षी! सुन, मेरी कृपासे अब समस्त शुभ गुण
तेरे हृदय में बसेंगे।।3।।
भगति ग्यान बिग्यान बिरागा। जोग चरित्र रहस्य बिभागा।।
जानब तैं सबही कर भेदा। मम प्रसाद नहिं साधन खेदा।।4।।
जानब तैं सबही कर भेदा। मम प्रसाद नहिं साधन खेदा।।4।।
भक्ति, ज्ञान, विज्ञान, वैराग्य, योग, मेरी लीलाएँ और उसके
रहस्य तथा विभाग-इन सबके भेदको तू मेरी कृपासे ही जान जायगा। तुझे साधन का
कष्ट नहीं होगा।।4।।
|
|||||
लोगों की राय
No reviews for this book






