रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (उत्तरकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (उत्तरकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 15
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। सप्तम सोपान उत्तरकाण्ड


दो.-लरिकाई जहँ जहँ फिरहिं तहँ तहँ संग उड़ाउँ।
जूठनि परइ अजिर महँ सो उठाइ करि खाउँ।।75क।।

लड़कपन में वे जहाँ-जहाँ फिरते हैं, वहाँ-वहाँ मैं साथ-साथ उड़ता हूँ और आँगन में उनकी जो जूठन पड़ती है, वही उठाकर खाता हूँ।।75(क)।।

एक बार अतिसय सब चरित किए रघुबीर।
सुमिरत प्रभु लीला सोइ पुलकित भयउ सरीर।।75ख।।

एक बार श्रीरघुबीर जी ने सब चरित्र बहुत अधिकता से किये। प्रभु की उस लीला का स्मरण करते ही काकभुशुण्डिजी का शरीर [प्रेमानन्दवश] पुलकित हो गया।।75(ख)।।

चौ.-कहइ भुसुंड सुनहु खगनायक। राम चरित सेवक सुखदायक।।
नृप मंदिर सुंदर सब भाँती। खचित कनक मनि नाना जाती।।1।।

भुशुण्डिजी कहने लगे-हे पक्षिराज! सुनिये, श्रीरामजी का चरित्र सेवकोंको सुख देनेवाला है। [अयोध्याका] राजमहल सब प्रकारसे सुन्दर है। सोने के महल में नाना प्रकार के रत्न जड़े हुए हैं।।1।।

बरनि न जाइ रुचिर अँगनाई। जहँ खेलहिं नित चारिउ भाई।।
बालबिनोद करत रघुराई। बिचरत अजिर जननि सुखदाई।।2।।

सुन्दर आँगन का वर्णन नहीं किया जा सकता, जहाँ चारो भाई नित्य खेलते हैं। माताको सुख देनेवाले बाल-विनोद करते हुए श्रीरघुनाथजी आँगनमें विचर रहे हैं।2।।

मरकत मृदुल कलेवर स्यामा। अंग अंग प्रति छबि बहु कामा।।
नव राजीव अरुन मृदु चरना। पदज रुचिर नख ससि दुति हरना।।3।।

मरकत मणि के समान हरिताभ श्याम और कोमल शरीर है। अंग-अंग में बहुत से काम देवों की शोभा छायी हुई है। नवीन [लाल] कमलके समान लाल-लाल कोमल चरण है। सुन्दर अँगुलियाँ हैं और नख अपनी ज्योति से चन्द्रमा की कान्ति को हरने वाले हैं।।3।।

ललित अंक कुलिसादिक चारी। नूपुर चारु मधुर रवकारी।।
चारु पुरट मनि रचित बनाई। कटि किंकिन कल मुखर सुहाई।।4।।

[तलवे में] वज्रादि (वज्र, अंकुश, ध्वजा और कमल) के चार सुन्दर चिह्न है। चरणों में मधुर शब्द करनेवाले सुन्दर नुपूर हैं। मणियों (रत्नों) से जड़ी हुई सोने की बनी हुई सुन्दर करधनीका शब्द सुहावना लग रहा है।।4।।

दो.-रेखा त्रय सुंदर उदर नाभी रुचिर गँभीर।।
उर आयत भ्राजत बिबिधि बाल बिभूषन चीर।।76।।

उदरपर सुन्दर तीन रेखाएँ (त्रिवली) हैं, नाभि सुन्दर और गहरी है। विशाल वक्षःस्थल पर अनेकों प्रकार के बच्चों के आभूषण और वस्त्र सुभोभित हैं।।76।।

चौ.-अरुन पानि नख करज मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर।।
कंध बाल केहरि दर ग्रीवा। चारु चिबुक आनन छबि सींवा।।1।।

लाल-लाल हथेलियाँ, नख और अँगुलियाँ मनको हरने वाले है और विशाल भुजाओं पर सुन्दर आभूषण हैं। बालसिंह (सिंहके बच्चे) के-से कंधे और शंख के समान (तीन रेखाओं से युक्त) गला है। सुन्दर ठुड्डी है और मुख तो छवि की सीमा है।।1।।

कलबल बचन अधर अरुनारे। दुइ दुई दसन बिसद बर बारे।।
ललित कपोल मनोहर नासा। सकल सुखद ससि कर सम हासा।।2।।

कलबल (तोतले) वचन हैं, लाल-लाल ओंठ हैं। उज्ज्वल, सुन्दर और छोटी-छोटी [ऊपर और नीचे] दो दो दँतुलियाँ हैं, सुन्दर गाल, मनोहर नासिका और सब सुखों को देनेवाली चन्द्रमा की [अथवा सुख देने वाली समस्त कलाओं से पूर्ण चन्द्रमा की] किरणों के समान मधुर मुसकान है।।2।।

नील कंज लोचन भव मोचन। भ्राजत भाल तिलक गोरोचन।।
बिकट भृकुटि सम श्रवन सुहाए। कुंचित कच मेचक छबि छाए।।3।।

नीले कमलके समान नेत्र जन्म-मृत्यु [के बन्धन] से छुड़ानेवाले हैं। ललाटपर गोरोचनका तिलक सुशोभित है। भौंहे टेढ़ी हैं। कान सम और सुन्दर हैं। काले और घुँघराले केशोंकी छवि छा रही है।।3।।

पीत झीनि झगुली तन सोही। किलकनि चितवनि भावति मोही।।
रूप रासि नृप अजिर बिहारी। नाचहिं निज प्रति बिंब निहारी।।4।।

पीली और महीन झगुली शरीर पर शोभा दे रही है। उनकी किलकारी और चितवन मुझे बहुत ही प्रिय लगती है। राजा दशरथजी के आँगन में विहार करनेवाली रूप की राशि श्रीरामचन्द्रजी अपनी परछाहीं देखकर नाचते हैं।।4।।

मोहि सन करहिं बिबिधि बिधि क्रीड़ा। बरनत मोहि होति अति ब्रीड़ा।।
किलकत मोहि धरन जब धावहिं। चलउँ भागि तब पूप देखावहिं।।5।।

और मुझसे बहुत प्रकार के खेल करते हैं, जिन चरित्रों का वर्णन करते मुझे लज्जी आती है। किलकारी मारते हुए जब वे मुझे पकड़ने दौड़ते और मैं भाग चलता तब मुझे पुआ दिखलाते थे।।5।।

दो.-आवत निकट हँसहिं प्रभु भाजत रुदन कराहिं।।
जाउँ समीप गहन पद फिरि फिरि चितइ पराहिं।।77क।।

मेरे निकट आने पर प्रभु हँसते हैं और भाग जाने पर रोते हैं। और जब मैं उनका चरण स्पर्श करने के लिये पास जाता हूँ, तब वे पीछे फिर-फिरकर मेरी ओर देखते हैं हुए भाग जाते हैं।।77(क)।।

प्राकृत सिसु इव लीला देखि भयउ मोहि मोह।
कवन चरित्र करत प्रभु चिदानंद संदोह।।77ख।।

साधारण बच्चों जैसी लीला देखकर मुझे मोह (शंका) हुआ कि सच्चिदानन्दघन प्रभु यह कौन [महत्त्व का] चरित्र (लीला) कर रहे हैं (विकास क्रम में जीव तम से रज और रज से सत् गुण की ओर बढ़ता है, परंतु अपने आप में सत् गुण भी मोह का कारण बन सकता है, जैसा कि कागभुशुण्डिजी को हुआ। प्रभु की प्रेरणा से उन्हें मोह हुआ जिसके फलस्वरूप इस मोह से होने वाले अशांति का निवारण करने की आवश्यकता अनुभव हुई, इस प्रकार त्रिगुणातीत अवस्था की अग्रसर हो सके) ।।77(ख)।।

चौ.-एतना मन आनत खगराया। रघुपति प्रेरित ब्यापी माया।।
सो माया न दुखद मोहि काहीं। आन जीव इव संसृत नाहीं।।1।।

हे पक्षिराज! मन में इतनी (शंका) लाते ही श्रीरघुनाथजी के द्वारा प्रेरित माया मुझपर छा गयी है। परंतु वह माया न तो मुझे दुःख देने वाली हुई और न दूसरे जीवों की भाँति संसार में डालने वाली हुई।।1।।

नाथ इहाँ कछु कारन आना। सुनहु सो सावधान हरिजाना।।
ग्यान अखंड एक सीताबर। माया बस्य जीव सचराचर।।2।।

हे नाथ! यहाँ कुछ दूसरा ही कारण है। हे भगवान् के वाहन गरुड़जी ! उसे सावधान होकर सुनिये। एक सीतापति श्रीरामजी ही अखण्ड ज्ञानस्वरुप हैं और जड़-चेतन सभी जीव माया के वश हैं।।2।।

जौं सब कें रह ग्यान एकरस। ईस्वर जीवहि भेद कहहु कस।।
माया बस्य जीव अभिमानी। ईस बस्य माया गुन खानी।।3।।

यदि जीवों को एकरस (अखण्ड) ज्ञान रहे तो कहिये, फिर ईश्वर और जीवमें भेद ही कैसा? अभिमानी जीव मायाके वश है और वह [सत्त्व, रज, तम-इन] तीनों गुणों की खान माया ईश्वर के वशमें है।।3।।

परबस जीव स्वबस भगवंता। जीव अनेक एक श्रीकंता।।
मुधा भेद जद्यपि कृत माया। बिनु हरि जाइ न कोटि उपाया।।4।।

जीव परतंत्र है, भगवान् स्वतंत्र हैं। जीव अनेक हैं, श्रीपति भगवान् एक हैं। यद्यपि माया का किया हुआ यह भेद असत् है तथापि वह भगवान् के भजन के बिना करोड़ों उपाय करनेपर भी नहीं जा सकता (चूँकि जीव सतत् त्रिगुणों के प्रभाव में रहता है, इसीलिए अपने चिदानन्द स्वरूप को भूल जाने के कारण संसार के बंधनों में जकड़ा हुआ है इसीलिए परतंत्र है, वहीं भगवान् तो स्वयं सद्चिदानन्द हैं, कारण है और कार्य दोनों ही हैं, इसलिए मात्र वे ही स्वतंत्र हैं।) ।।4।।

दो.-रामचंद्र के भजन बिनु जो चह पद निर्बान।।
ग्यानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूँछ बिषान।।78क।।

श्रीरामचन्द्रजी के भजन बिना जो मोक्षपद चाहता है, वह मनुष्य ज्ञानवान् होनेपर भी बिना पूँछ और सींग का पशु है।।78(क)।।

राकापति षोडस उअहिं तारागन समुदाइ।
सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ।।78ख।।

सभी तारागणों के साथ सोलह कलाओं से पूर्ण चन्द्रमा उदय हो और जितने पर्वत हैं, उन सबमें दावाग्नि लगा दी जाय, तो भी सूर्य के उदय हुए बिना रात्रि नहीं जा सकती।।78(ख)।।

चौ.-ऐसेहिं हरि बिनु भजन खगेसा। मिटइ न जीवन्ह केर कलेसा।।
हरि सेवकहि न ब्याप अबिद्या। प्रभु प्रेरित ब्यापइ तेहि बिद्या।।1।।

हे पक्षिराज! इसी प्रकार श्री हरि के भजन बिना जीवोंका क्लेश नहीं मिटता। श्रीहरि के सेवक को अविद्या नहीं व्यापती। प्रभु की प्रेरणा से उसे विद्या व्यापती है (श्रीहरि का सेवक भी जीव स्वयं नहीं बन पाता, बल्कि श्रीहरि की कृपा से ही उसे विद्या व्यापती है, तब ही वह सेवक भी बनता है)।।1।।

ताते नास न होइ दास कर। भेद भगति बाढ़इ बिहंगबर।।
भ्रम तें चकित राम मोहि देखा। बिहँसे सो सुनु चरित बिसेषा।।2।।

हे पक्षिराज! इसी से दास का नाश नहीं होता और भेद-भक्ति बढ़ती है। श्रीरामजीने मुझे जब भ्रम से चकित देखा, तब वे हँसे। वह विशेष चरित्र सुनिये।।2।।

तेहि कौतुक कर मरमु न काहूँ। जाना अनुज न मातु पिताहूँ।।
जानु पानि धाए मोहि धरना। स्यामल गात अरुन कर चरना।।3।।

उस खेल का मर्म किसी ने नहीं जाना, न छोटे भाइयों ने और न माता पिता ने ही। वे श्याम शरीर और लाल-लाल हथेली और चरणतल वाले बालरूप श्रीरामजी घुटने और हाथों के बल मुझे पकड़ने को दौड़े।।3।।

तब मैं भागि चलेउँ उरगारी। राम गहन कहँ भुजा पसारी।।
जिमि जिमि दूरि उड़ाउँ अकासा। तहँ भुज हरि देखउँ निज पासा।।4।।

हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी! तब मैं भाग चला। श्रीरामजी ने मुझे पकड़ने के लिये भुजा फैलायी। मैं जैसे-जैसे आकाशमें दूर उड़ता, वैसे-वैसे ही वहाँ श्रीहरि की भुजा को अपने पास देखता था।।4।।

दो.-ब्रह्मलोक लगि गयउँ मैं चितयउँ पाछ उड़ात।
जुग अंगुल कर बीच सब राम भुजहि मोहि तात।।79क।।

मैं ब्रह्मलोक तक गया और जब उड़ते हुए मैंने पीछे की ओर देखा, तो हे तात! श्रीरामजी की भुजा में और मुझमें केवल दो अंगुल का बीच था।।79(क)।।

सप्ताबरन भेद करि जहाँ लगें गति मोरि।
गयउँ तहाँ प्रभु भुज निरखि ब्याकुल भयउँ बहोरि।।79ख।।

सातों आवरणों को भेदकर जहाँतक मेरी गति थी वहाँतक मैं गया। पर वहाँ भी प्रभुकी भुजा को [अपने पीछे] देखकर व्याकुल हो गया।।79(ख)।।

चौ.-मूदेउँ नयन त्रसित जब भयऊँ। पुनि चितवत कोसलपुर गयऊँ।।
मोहि बिलोकि राम मुसुकाहीं। बिहँसत तुरत गयउँ मुख माहीं।।1।।

जब मैं भयभीत हो गया, तब मैंने आँखें मूँद लीं। फिर आँखे खोलकर देखते ही अवधपुरी में पहुँच गया। मुझे देखकर श्रीरामजी मुसकाने लगे। उनके हँसते ही मैं तुरंत उनके मुख में चला गया।।1।।

उदर माझ सुनु अंडज राया। देखेउँ बहु ब्रह्मांड निकाया।।
अति बिचित्र तहँ लोक अनेका। रचना अधिक एक ते एका।।2।।

हे पक्षिराज! सुनिये, मैंने उनके पेट में बहुत से ब्रह्माण्डोंके समूह देखे। वहाँ उन (ब्रह्माण्डों में) अनेकों विचित्र लोक थे, जिनकी रचना एक-से-एक बढ़कर थी।।2।।

कोटिन्ह चतुरानन गौरीसा। अगनित उडगन रबि रजनीसा।।
अगनित लोकपाल मन काला। अगनित भूधर भूमि बिसाला।।3।।

करोड़ों ब्रह्मा जी और शिवजी, अनगिनत तारागण, सूर्य और चन्द्रमा, अनगिनत लोकपाल, यम और काल, अनगिनत विशाल पर्वत और भूमि।।3।।

सागर सरि सर बिपिन अपारा। नाना भाँति सृष्टि बिस्तारा।।
सुर मुनि सिद्ध नाग नर किंनर। चारि प्रकार जीव सचराचर।।4।।

असंख्य समुद्र नदी तालाब और वन तथा और भी नाना प्रकार की सृष्टि का विस्तार देखा। देवता, मुनि, सिद्ध, नाग, मनुष्य, किन्नर, तथा चारों प्रकार के जड़ और चेतन जीव देखे।।4।।

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