रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (उत्तरकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (उत्तरकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
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मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 15
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। सप्तम सोपान उत्तरकाण्ड


दो.-ग्यानी तापस सूर कबि कोबिद गुन आगार।
केहि कै लोभ बिडंबना कीन्हि न एहिं संसार।।70क।।

इस संसार में ऐसा कौन सा ज्ञानी, तपस्वी, शूरवीर, कपि, विद्वान और गुणों का धाम है, जिसकी लोभने बिडम्बना (मिट्टी पलीद) न की हो।।70(क)।।

श्री मद बक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि।
मृगलोचनि के नैन सर को अस लाग न जाहि।।70ख।।

लक्ष्मी के मदने किसको टेढ़ा और प्रभुताने किसको बहरा नहीं कर दिया? ऐसा कौन है, जिसे मृगनयनी (युवती स्त्री) के नेत्र-बाण न लगे हों।।70(ख)।।

चौ.-गुन कृत सन्यपात नहिं केही। कोउ न मान मद तजेउ निबेही।।
जोबन ज्वर केहि नहिं बलकावा। ममता केहि कर जस न नसावा।।1।।

[रज, तम आदि] गुणों का किया हुआ सन्निपात किसे नहीं हुआ? ऐसा कोई नहीं है जिसे मान और मद ने अछूता छोड़ा हो। यौवन के ज्वर ने किसे आपे से बाहर नहीं किया? ममता ने किसके यश का नाश नहीं किया?।।1।।

मच्छर काहि कलंक न लावा। काहि न सोक समीर डोलावा।।
चिंता साँपिनि को नहिं खाया। को जग जाहि न ब्यापी माया।।2।।

मत्सर (डाह) ने किसको कलंक नहीं लगाया? शोकरूपी पवन ने किसे नहीं हिला दिया? चिन्तारूपी साँपिन ने किसे नहीं खा लिया? जगत् में ऐसा कौन है, जिसे माया न व्यापी हो?।।2।।

कीट मनोरथ दारु सरीरा। जेहि न लाग घुन को अस धीरा।।
सुत बित लोक ईषना तीनी। केहि कै मति इन्ह कृत न मलीनी।।3।।

मनोरथ कीड़ा है, शरीर लकड़ी है। ऐसा धैर्यवान कौन है, जिसके शरीर में यह कीड़ा न लगा हो? पुत्र की, धन की और लोक प्रतिष्ठा की-इन तीन प्रबल इच्छाओं ने किसकी बुद्धि को मलिन नहीं कर दिया (बिगाड़ नहीं दिया)?।।3।।

यह सब माया कर परिवारा। प्रबल अमिति को बरनै पारा।।
सिव चतुरानन जाहि डेराही। अपर जीव केहि लेखे माहीं।।4।।

यह सब माया का बड़ा बलवान् परिवार है। यह अपार है, इसका वर्णन कौन कर सकता है? शिवजी और ब्रह्माजी भी जिससे डरते हैं, तब दूसरे जीव तो किस गिनती में है?।।4।।

दो.-ब्यापि रहेउ संसार महुँ माया कटक प्रचंड।
सेनापति कामादि भट दंभ कपट पाषंड।।71क।।

मायाकी प्रचण्ड सेना संसारभर में छायी हई है। कामादि (काम, क्रोध और लोभ) उसके सेना पति हैं और दम्भ, कपट और पाखण्ड योद्धा हैं।।71(क)।।

सो दासी रघुबीर कै समुझें मिथ्या सोपि।।
छूट न राम कृपा बिनु नाथ कहउँ पद रोपि।।71ख।।

वह माया श्रीरघुवीर की दासी है। यद्यपि समझ लेने पर वह मिथ्या ही है, किन्तु वह श्रीरामजीकी कृपाके बिनी छूटती नहीं। हे नाथ! यह मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ।।71(ख)।।

चौ.-जो माया सब जागहि नचावा। जासु चरित लखि काहुँ न पावा।।
सोइ प्रभु भ्रू बिलास खगराजा। नाच नटी इव सहित समाजा।।1।।

जो माया सारे जगत् को नचाती है और जिसका चरित्र (करनी) किसी ने नहीं लख पाया, हे खगराज गरुड़जी! वही माया प्रभु श्रीरामचन्द्रजी की भ्रुकुटीके इशारेपर अपने समाज (परिवार) सहित नटी की तरह नाचती है।।1।।

सोइ सच्चिदानंद घन रामा। अज बिग्यान रूप बल धामा।।
ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता। अखिल अमोघसक्ति भगवंता।।2।।

श्रीरामजी वही सच्चिदानन्दघन हैं जो अजन्मा, विज्ञानस्वरूप, रूप और बलके धाम, सर्वव्यापक एवं व्याप्य (सर्वरूप) अखण्ड, अनन्त, सम्पूर्ण अमोघशक्ति (जिसकी शक्ति कभी व्यर्थ नहीं होती) और छः ऐशर्यों से युक्त भगवान् हैं।।2।।

अगुन अदभ्र गिरा गोतीता। सबदरसी अनवद्य अजीता।।
निर्मम निराकार निरमोहा। नित्य निरंजन सुख संदोहा।।3।।

वे निर्गुण (माया के गणों से रहित), महान् वाणी और इन्दियोंसे परे सब कुछ देखनेवाले, निर्दोष, अजेय, ममतारहित, निराकार (मायिक आकारसे रहित), मोहरहित, नित्य, मायारहित, सुख की राशि,।।3।।

प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी। ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी।।
इहाँ मोह कर कारन नाहीं। रबि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं।।4।।

प्रकृति से परे, प्रभु (सर्वसमर्थ) सदा सबके हृदय में बसने वाले, इच्छारहित, विकाररहित, अविनाशी ब्रह्म हैं। यहाँ (श्रीराम में) मोह का कारण ही नहीं है। क्या अन्धकार का समूह कभी सूर्य के सामने जा सकता है?।।4।।

दो.-भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप।
किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप।।72क।।

भगवान् प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने भक्तोंके लिये राजाका शरीर धारण किया और साधारण मनुष्योंके-से अनेकों परम पावन चरित्र किये।।72(क)।।

जथा अनेक बेष धरि नृत्य करइ नट कोइ।
सोइ सोइ भाव देखावइ आपुन होइ न सोइ।।72ख।।

जैसे कोई नट (खेल करनेवाला) अनेक वेष धारण करके नृत्य करता है, और वही-वही (जैसा वेष होता है, उसीके अनुकूल) भाव दिखलाता है; पर स्वयं वह उनमेंसे कोई हो नहीं जाता।। (परम ब्रह्म परमात्मा की चेतना से पाँच कोषों द्वारा बना हुआ यह जीव प्रत्येक कोष के स्तर पर अपना कार्य सुचारु रूप से करता रहता है, जहाँ चेतना केंद्रित होती है, उसी कोष का काम चलता रहता है, परंतु आत्मा की चेतना इनमें से नट की तरह तटस्थ रहती है।) 72(ख)।।

चौ.-असि रघुपति लीला उरगारी। दनुज बिमोहनि जन सुखकारी।।
जे मति मलिन बिषय बस कामी। प्रभु पर मोह धरहिं इमि स्वामी।।1।।

हे गरुड़जी! ऐसी ही श्रीरघुनाथजी की यह लीला है, जो राक्षसों को विशेष मोहित करनेवाली और भक्तों को सुख देनेवाली है। हे स्वामी! जो मनुष्य मलिन बुद्धि, विषयों के वश और कामी हैं, वे ही प्रभु पर इस प्रकार मोह का आरोप करते हैं (प्रभु की लीला न समझने वाले लोग अपनी बुद्धि के मोह का कारण भगवान की लीला को समझते हैं, इस प्रकार भोले और बाल-बुद्धि वाले लोगों को भी भ्रमित करते हैं)।।1।।

नयन दोष जा कहँ जब होई। पीत बरन ससि कहुँ कह सोई।।
जब जेहि दिसि भ्रम होइ खगेसा। सो कह पच्छिम उयउ दिनेसा।।2।।

जब जिसको [कँवल आदि] नेत्र दोष होता है, तब वह चन्द्रमा को पीले रंग का कहता है। हे पक्षिराज! जब जिसे दिशाभ्रम होता है, तब वह कहता है कि सूर्य पश्चिम में उदय हुआ है।।2।।

नौकारूढ़ चलत जग देखा। अचल मोह बस आपुहि लेखा।।
बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादी। कहहिं परस्पर मिथ्याबादी।।3।।

नौका पर चढ़ा हुआ मनुष्य जगत् को चलता हुआ देखता है और मोह वश अपने को अचल समझता है। बालक घूमते हैं, घर आदि नहीं घूमते, इस प्रकार परम सत्य को न समझने वाले अर्थात् मिथ्यावादी लोग अपने स्तर से ऊपर न उठ पाने के कारण स्वयं भी मिथ्या जानते हैं और दूसरों को भी मिथ्या ही बताते हैं। (रेलवे स्टेशन पर रुकी हुई गाड़ी में बैठा व्यक्ति गंतव्य तक जल्दी पहुँचने की आकांक्षा में बगल वाली गाड़ी के चलने पर उसे तो रुका हुआ समझता है और अपनी गाड़ी को चलने वाला मान बैठता है, इसी प्रकार छोटे बालक जब एक स्थान पर खड़े होकर लट्टू की भाँति घूमते हैं तो रुकने के बाद उन्हें ऐसा लगता है कि वे तो रुके हैं पर आस-पास के घर घूम रहे हैं) ।।3।।

हरि बिषइक अस मोह बिहंगा। सपनेहुँ नहिं अग्यान प्रसंगा।।
मायाबस मतिमंद अभागी। हृदयँ जमनिका बहुबिधि लागी।।4।।

हे गरुड़जी! श्रीहरिके बिषय में मोह की कल्पना भी ऐसी ही है, भगवान् में तो स्वप्नमें भी अज्ञानका प्रसंग (अवसर) नहीं है। किन्तु जो माया के वश, मन्दबुद्धि और भाग्यहीन हैं और जिनके हृदय पर अनेकों प्रकारके परदे पड़े हैं।।4।।

ते सठ हठ बस संसय करहीं। निज अग्यान राम पर धरहीं।।5।।

वे मूर्ख हठ के वश होकर सन्देह करते हैं और अपना अज्ञान श्रीरामजी पर आरोपित करते हैं।।5।।

दो.-काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त दुखरूप।
ते किमि जानहिं रघुपतिहि मूढ़ परे तम कूप।।73क।।

जो काम, क्रोध, मद और लोभ में रत हैं और दुःखरूप घरमें आसक्त हैं, वे श्रीरघुनाथजी को कैसे जान सकते हैं? वे मूर्ख तो अन्धकार रूपी कुएँ में पड़े हुए हैं।।73(क)।।

निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोई।
सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ।।73ख।।

निर्गुण रूप अत्यन्त सुलभ (सहज ही समझ में आ जाने वाला) है, परंतु [गुणातीत दिव्य] सगुण रूपको कोई नहीं जानता। इसलिये उन सगुण भगवान् को अनेक प्रकार के सुगम और अगम चरित्रोंको सुनकर मुनियों के भी मन को भ्रम हो जाता है।।73(ख)।।

चौ.-सुनु खगेस रघुपति प्रभुताई। कहउँ जथामति कथा सुहाई।
जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही। सोउ सब कथा सुनावउँ तोही।।1।।

हे पक्षीराज गरुड़जी! श्रीरघुनाथजी की प्रभुता सुनिये। मैं अपनी बुद्धि के अनुसार वह सुहावनी कथा कहता हूँ। हे प्रभो! मुझे जिस प्रकार मोह हुआ है, वह सब कथा भी आपको सुनाता हूँ।।1।।

राम कृपा भाजन तुम्ह ताता। हरि गुन प्रीति मोहि सुखदाता।।
ताते नहिं कछु तुम्हहिं दुरावउँ। परम रहस्य मनोहर गावउँ।।2।।

हे तात! आप श्रीरामजीके कृपा पात्र है। श्रीहरिके गुणों में आपकी प्रीति है, इसीलिये आप मुझे सुख देनेवाले हैं। इसी से मैं आपसे कुछ भी नहीं छिपाता और अत्यन्त रहस्य की बातें आपको गाकर सुनाता हूँ।।2।।

सुनहु राम कर सहज सुभाऊ। जन अभिमान न राखहिं काऊ।।
संसृत मूल सूलप्रद नाना। सकल सोक दायक अभिमाना।।3।।

श्रीरामचन्द्रजीका सहज स्वभाव सुनिये; वे भक्तों में अभिमान कभी नहीं रहने देते। क्योंकि अभिमान जन्म-मरणरूप संसारका मूल है और अनेक प्रकार के क्लेशों तथा समस्त शोकों को देनेवाला है (व्यक्ति अपनी शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक क्षमता का स्वामी स्वयं को समझने लगता है, तथा यह भूल जाता है कि इन सबका आधार उसकी चेतना है, यदि चेतना ही न रहे तो ये सभी क्षमाताएँ अपने आप निष्प्रभावी हो जाती हैं। प्रभु की कृपा से ही व्यक्ति की ध्यान अपनी इन क्षमताओं से हठकर इनके वास्तविक आधार पर जाता है)।।3।।

ताते करहिं कृपानिधि दूरी। सेवक पर ममता अति भूरी।।
जिमि सिसु तन ब्रन होइ गोसाईं। मातु चिराव कठिन की नाईं।।4।।

इसीलिये कृपानिधि उसे दूर कर देते हैं; क्योंकि सेवक पर उनकी बहुत ही अधिक ममता है। हे गोसाईं! जैसे बच्चे के शरीर में फोड़ा हो जाता है, तो माता उसे कठोर हृदय की भाँति चिरा डालती है (सांसारिक व्यापारों के फोड़ों से हठकर परमात्मा पर ध्यान तभी जाता है, जब प्रभु विवेक और वैराग्य की कठिन दवा का चीरा लगाते हैं)।।4।।

दो.-जदपि प्रथम दुख पावइ रोवइ बाल अधीर।
ब्याधि नास हित जननी गनति न सो सिसु पीर।।74क।।

यद्यपि बच्चा पहले (फोड़ा चिराते समय) दुःख पाता है और अधीर होकर रोता है, तो भी रोगके नाश के लिये माता बच्चे की उस पीड़ा को कुछ भी नहीं गिनती (उसकी परवा नहीं करती और फोड़े कों चिरवा ही डालती है, इसी प्रकार प्रभु जिस पर कृपा करते हैं, कभी-कभी उनके लिए कठिन और कष्टकारी निदान भी सुनिश्चित कर देते हैं)।।74(क)।।

तिमि रघुपति निज दास कर हरहिं मान हित लागि।
तुलसिदास ऐसे प्रभुहि कस न भजहु भ्रम त्यागि।।74ख।।

उसी प्रकार श्रीरघुनाथजी अपने दास का अभिमान उसके हितके लिये हर लेते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि ऐसे प्रभुको भ्रम त्यागकर क्यों नहीं भजा जाये? अर्थात् यह तो बड़े ही उत्साह से सभी को करना चाहिए।।74(ख)।।

चौ.-राम कृपा आपनि जड़ताई। कहउँ खगेस सुनहु मन लाई।।
जब जब राम मनुज तनु धरहीं। भक्त हेतु लीला बहु करहीं।।1।।

हे पक्षिराज गरुड़जी! श्रीरामजीकी कृपा और अपनी जड़ता (मूर्खता) की बात कहता हूँ, मन लगाकर सुनिये। जब-जब श्रीरामचन्द्रजी मनुष्य शरीर धारण करते हैं और भक्तों के लिये बहुत-सी लीलाएँ करते हैं,।।1।।

तब तब अवधपुरी मैं जाऊँ। बालचरित बिलोकि हरषाऊँ।
जन्म महोत्सव देखउँ जाई। बरष पाँच तहँ रहउँ लोभाई।।2।।

तब-तब मैं अयोध्यापुरी जाता हूँ और उनकी बाल लीला देखकर हर्षित होता हूँ। वहाँ जाकर मैं जन्म महोत्सव देखता हूँ और [भगवान् की शिशुलीलामें] लुभाकर पाँच वर्ष तक वहीं रहता हूँ।।2।।

इष्टदेव मम बालक रामा। सोभा बपुष कोटि सत कामा।।
निज प्रभु बदन निहारि निहारी। लोचन सुफल करउँ उरगारी।।3।।

बालक रूप श्रीरामचन्द्रजी मेरे इष्ट देव हैं, जिनके शरीर में अरबों कामदेवों की शोभा है। हे गरुड़जी! अपने प्रभु का मुख देख-देखकर मैं नेत्रों को सफल करता हूँ।।3।।

लघु बायस बपु धरि हरि संगा। देखउँ बालचरित बहु रंगा।।4।।

छोटे-से कौए का शरीर धरकर और भगवान् के साथ-साथ फिर कर मैं उनके भाँति-भाँति के बालचरित्रों को देखा करता हूँ।।4।।

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