आरती >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (उत्तरकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (उत्तरकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। सप्तम सोपान उत्तरकाण्ड
दो.-पुनि प्रभु हरषि सत्रुहन भेंटे हृदयँ लगाइ।।
लछिमन भरत मिले तब परम प्रेम दोउ भाइ।।5।।
लछिमन भरत मिले तब परम प्रेम दोउ भाइ।।5।।
फिर प्रभु हर्षित होकर शत्रुघ्नजीको हृदय से लगाकर उनसे मिले।
तब लक्ष्मणजी और भरतजी दोनों भाई परम प्रेम से मिले।।5।।
चौ.-भरतानुज लछिमन पुनि भेंटे। दुसह बिरह संभव दुख मेटे।।
सीता चरन भरत सिरु नावा। अनुज समेत परम सुख पावा।।1।।
सीता चरन भरत सिरु नावा। अनुज समेत परम सुख पावा।।1।।
फिर लक्ष्मणजी शत्रुघ्न जी से गले लगकर मिले औऱ इस प्रकार
विरहसे उत्पन्न दुःखका नाश किया। फिर भाई शत्रुघ्नजीसहित भरतजीने सीताजीके
चरणोंमें सिर नवाया और परम सुख प्राप्त किया।।1।।
प्रभु बिलोकि हरषे पुरबासी। जनित बियोगबिपति सब नासी।।
प्रेमातुर सब लोग निहारी। कौतुक कीन्ह कृपाल खरारी।।2।।
प्रेमातुर सब लोग निहारी। कौतुक कीन्ह कृपाल खरारी।।2।।
प्रभुको देखकर अयोध्यावासी सब हर्षित हुए। वियोगसे उत्पन्न सब
दुःख नष्ट हो गये। सब लोगों को प्रेमविह्वल [और मिलनेके लिये अत्यन्त आतुर]
देखकर खरके शत्रु कृपालु श्रीरामजीने एक चमत्कार किया।।2।।
अमित रूप प्रगटे तेहि काला। जथाजोग मिले सबहि कृपाला।।
कृपादृष्टि रघुबीर बिलोकी। किए सकल नर नारि बिसोकी।।3।।
कृपादृष्टि रघुबीर बिलोकी। किए सकल नर नारि बिसोकी।।3।।
उसी समय कृपालु श्रीरामजी असंख्य रूपों में प्रकट हो गये और
सबसे [एक ही साथ] यथायोग्य मिले। श्रीरघुवीरने कृपाकी दृष्टिसे देखकर सब
नर-नारियों को शोकसे रहित कर दिया।।3।।
छन महिं सबहिं मिले भगवाना। उमा मरम यह काहुँ न जाना।।
एहि बिधि सबहि सुखी करि रामा। आगें चले सील गुन धामा।।4।।
एहि बिधि सबहि सुखी करि रामा। आगें चले सील गुन धामा।।4।।
भगवान् क्षण मात्र में सबसे मिल लिये। हे उमा! यह रहस्य किसी
ने नहीं जाना। इस प्रकार शील और गुणों के धाम श्रीरामजी सबको सुखी करके आगे
बढ़े।।4।।
कौसल्यादि मातु सब धाई। निरखि बच्छ जनु धेनु लवाई।।5।।
कौसल्या आदि माताएँ ऐसे दौड़ीं मानो नयी ब्यायी हुई गौएँ अपने
बछड़ों को देखकर दौंड़ी हों।।5।।
छं.-जनु धेनु बालक बच्छ तजि गृहँ चरन बन परबस गईं।
दिन अंत पुर रुख स्रवत थन हुंकार करि धावत भईं।।
अति प्रेम प्रभु सब मातु भेटीं बचन मृदु बहुबिधि कहे।
गइ बिषम बिपति बियोगभव तिन्ह हरष सुख अगनित लहे।।
दिन अंत पुर रुख स्रवत थन हुंकार करि धावत भईं।।
अति प्रेम प्रभु सब मातु भेटीं बचन मृदु बहुबिधि कहे।
गइ बिषम बिपति बियोगभव तिन्ह हरष सुख अगनित लहे।।
मानो नयी ब्यायी हुई गौएँ अपने छोटे बछड़ों को घर पर छोड़
परवश होकर वनमें चरने गयी हों और दिन का अन्त होने पर [बछड़ोंसे मिलने के
लिये] हुंकार करके थन से दूध गिराती हुई नगर की ओर दौड़ीं हों। प्रभु ने
अत्यन्त प्रेमसे सब माताओंसे मिलकर उनसे बहुत प्रकार के कोमल वचन कहे।
वियोगसे उत्पन्न भयानक विपत्ति दूर हो गयी और सबने [भगवान् से मिलकर और
उनके वचन सुनकर] अगणित सुख और हर्ष प्राप्त किये।
दो.-भेटेउ तनय सुमित्राँ राम चरन रति जानि। रामहि मिलत कैकई हृदयँ बहुत सकुचानि।।6क।।
सुमित्राजी अपने पुत्र लक्ष्मणजीकी श्रीरामजीके चरणों में
प्रीति जानकर उनसे मिलीं। श्रीरामजीसे मिलते समय कैकेयीजी हृदय में बहुत
सकुचायीं।।6(क)।।
लछिमन सब मातन्ह मिलि हरषे आसिष पाइ।
कैकइ कहँ पुनि पुनि मिले मन कर छोभु न जाइ।।6ख।।
कैकइ कहँ पुनि पुनि मिले मन कर छोभु न जाइ।।6ख।।
लक्ष्मणजी भी सब माताओंसे मिलकर और आशीर्वाद पाकर हर्षित हुए।
वे कैकेयी जी से बार-बार मिले, परन्तु उनके मनका क्षोभ (रोष) नहीं
जाता।।6(ख)।।
चौ.-सासुन्ह सबनि मिली बैदेही। चरनन्हि लागि हरषु अति
तेही।।
देहिं असीस बूझि कुसलाता। होइ अचल तुम्हार अहिवाता।।1।।
देहिं असीस बूझि कुसलाता। होइ अचल तुम्हार अहिवाता।।1।।
जानकीजी सब सासुओं से मिलीं और उनके चरणों लगकर उन्हें
अत्यन्त हर्ष हुआ। सासुएँ कुशल पूछकर आशिष दे रही हैं कि तुम्हारा सुहाग
अचल हो।।1।।
सब रघुपति मुख कमल बिलोकहिं। मंगल जानि नयन जल रोकहिं।।
कनक थार आरती उतारहिं। बार बार प्रभु गात निहारहिं।।2।।
कनक थार आरती उतारहिं। बार बार प्रभु गात निहारहिं।।2।।
सब माताएँ श्रीरघुनाथजीका कमल-सा मुखड़ा देख रही हैं।
[नेत्रोंसे प्रेमके आँसू उमड़े आते हैं; परन्तु] मंगलका समय जानकर वे
आँसुओंके जलको नेत्रोंमें ही रोक रखती हैं। सोनेके थाल से आरती उतारती हैं
और बार-बार प्रभुके श्री अंगोकी ओर देखती हैं।।2।।
नाना भाँति निछावरि करहीं। परमानंद हरष उर भरहीं।।
कौसल्या पुनि पुनि रघुबीरहि। चितवति कृपासिंधु रनधीरहि।।3।।
कौसल्या पुनि पुनि रघुबीरहि। चितवति कृपासिंधु रनधीरहि।।3।।
अनेकों प्रकार की निछावरें करती हैं और हृदय में परमानन्द तथा
हर्ष भर रही हैं। कौसल्याजी बार-बार कृपाके समुद्र और रणधीर श्रीरघुवीर को
देख रही हैं।।3।।
हृदयँ बिचारति बारहिं बारा। कवन भाँति लंकापति मारा।।
अति सुकुमार जुगल मेरे बारे। निसिचर सुभट महाबल भारे।।4।।
अति सुकुमार जुगल मेरे बारे। निसिचर सुभट महाबल भारे।।4।।
वे बार-बार हृदय में विचारती हैं कि इन्होंने लंका पति रावणको
कैसे मारा? मेरे ये दोनों बच्चे बड़े ही सुकुमार हैं और राक्षस तो बड़े
भारी योद्धा और महान् बली थे।।4।।
दो.-लछिमन अरु सीता सहित प्रभुहि बिलोकित मातु।
परमानंद मगन मन पुनि पुनि पुलकित गातु।।7।।
परमानंद मगन मन पुनि पुनि पुलकित गातु।।7।।
लक्ष्मणजी और सीताजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको माता देख
रही हैं। उनका मन परमानन्द में मग्न है और शरीर बार बार पुलकित हो रहा
है।।7।।
चौ.- लंकापति कपीस नल नीला। जामवंत अंगद सुभसीला।।
हनुमदादि सब बानर बीरा। धरे मनोहर मनुज सरीरा।।1।।
हनुमदादि सब बानर बीरा। धरे मनोहर मनुज सरीरा।।1।।
लंकापति विभीषण, वानरराज सुग्रीव, नल, नील, जाम्बवान् और अंगद
तथा हनुमान् जी आदि सभी उत्तम स्वभाव वाले वीर वानरोंने मनुष्योंके मनोहर
शरीर धारण कर लिये।।1।।
भरत सनेह सील ब्रत नेमा। सादर सब बरनहिं अति प्रेमा।।
देखि नगरबासिन्ह कै रीती। सकल सराहहिं प्रभु पद प्रीति।।2।।
देखि नगरबासिन्ह कै रीती। सकल सराहहिं प्रभु पद प्रीति।।2।।
वे सब भरत जी के प्रेम, सुन्दर स्वभाव, [त्यागके] व्रत और
नियमों की अत्यन्त प्रेमसे आदरपूर्वक बड़ाई कर रहे हैं। और नगरनिवासियों की
[प्रेम, शील और विनयसे पूर्ण] रीति देखकर वे सब प्रभुके चरणोंमें उनके
प्रेमकी सराहना कर रहे हैं।।2।।
पुनि रघुपति सब सखा बोलाए। मुनि पद लागहु सकल सिखाए।।
गुर बसिष्ट कुलपूज्य हमारे। इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे।।3।।
गुर बसिष्ट कुलपूज्य हमारे। इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे।।3।।
फिर श्रीरघुनाथजीने सब सखाओंको बुलाया और सबको सिखाया कि मुनि
के चरणों में लगो। ये गुरु वसिष्ठजी हमारे कुलभर के पूज्य हैं। इन्हीं की
कृपा से रणमें राक्षस मारे गये हैं।।3।।
ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे। भए समर सागर कहँ बेरे।।
मम हित लागि जन्म इन्ह हारे। भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे।।4।।
मम हित लागि जन्म इन्ह हारे। भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे।।4।।
[फिर गुरुजीसे कहा-] हे मुनि! सुनिये। ये सब मेरे सखा हैं। ये
संग्रामरूपी समुद्र में मेरे लिये बेड़े (जहाज) के समान हुए। मेरे हित के
लिये इन्होंने अपने जन्मतक हार दिये। (अपने प्राणोंतक को होम दिया)। ये
मुझे भरतसे भी अधिक प्रिय हैं।।4।।
सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। निमिष निमिष उपजत सुख नए।।5।।
प्रभुके वचन सुनकर सब प्रेम और आनन्द में मग्न हो गये। इस
प्रकार पल-पल में उन्हें नये-नये सुख उत्पन्न हो रहे हैं।।5।।
दो.-कौसल्या के चरनन्हि पुनि तिन्ह नायउ माथ।
आसिष दीन्हे हरषि तुम्ह प्रिय मम जिमि रघुनाथ ।।8क।।
आसिष दीन्हे हरषि तुम्ह प्रिय मम जिमि रघुनाथ ।।8क।।
फिर उन लोगों ने कौसल्या जी के चरणोंमें मस्तक नवाये।
कौसल्याजीने हर्षित होकर आशिषें दीं [और कहा-] तुम मुझे रघुनाथ के समान
प्यारे हो।।8(क)।।
सुमन बृष्टि नभ संकुल भवन चले सुखकंद।
चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नगर नारि नर बृंद।।8ख।।
चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नगर नारि नर बृंद।।8ख।।
आनन्दकन्द श्रीरामजी अपने महल को चले, आकाश फूलों की वृष्टि
से छा गया। नगरके स्त्री-पुरुषों के समूह अटारियों पर चढ़कर उनके दर्शन कर
रहे हैं।।8(ख)।।
चौ.-कंचन कलस बिचित्र संवारे। सबहिं धरे सजि निज निज
द्वारे।।
बंदनवार पताका केतू। सबन्हि बनाए मंगल हेतू।।1।।
बंदनवार पताका केतू। सबन्हि बनाए मंगल हेतू।।1।।
सोनेके कलशों को विचित्र रीतिसे [मणि-रत्नादिसे] अलंकृत कर और
सजाकर सब लोगोंने अपने-अपने दरवाजों पर रख लिया। सब लोगों ने मंगलके लिये
बंदनवार, ध्वजा और पताकाएँ लगायीं।।1।।
बीथीं सकल सुगंध सिंचाई। गजमनि रचि बहु चौक पुराईं।।
नाना भाँति सुमंगल साजे। हरषि नगर निसान बहु बाजे।।2।।
नाना भाँति सुमंगल साजे। हरषि नगर निसान बहु बाजे।।2।।
सारी गलियाँ सुगन्धित द्रवोंसे सिंचायी गयीं। गजमुक्ताओंसे
रचकर बहुत-सी चौकें पुरायी गयीं अनेकों प्रकार के सुन्दर मंगल-साज सजाये
गये और हर्षपूर्वक नगरमें बहुत-से डंके बजने लगे।।2।।
जहँ तहँ नारि निछावरि करहीं। देहिं असीस हरष उर भरहीं।।
कंचन थार आरतीं नाना। जुबतीं सजें करहिं सुभ गाना।।3।।
कंचन थार आरतीं नाना। जुबतीं सजें करहिं सुभ गाना।।3।।
स्त्रियाँ जहाँ-तहाँ निछावर कर रही है, और हृदय में हर्षित
होकर आशीर्वाद देती है। बहुत-सी युवती [सौभाग्यवती] स्त्रियाँ सोने के
थालों में अनेकों प्रकारकी आरती सजाकर मंगलगान कर रही है।।3।।
करहिं आरती आरतिहर कें। रघुकुल कमल बिपिन दिनकर कें।।
पुर शोभा संपति कल्याना। निगम सेष सारदा बखाना।।4।।
पुर शोभा संपति कल्याना। निगम सेष सारदा बखाना।।4।।
वे आर्तिहर (दुःखोंको हरनेवाले) और सूर्यकुलरूपी कमलवनके
प्रफुल्लित करनेवाले सूर्य श्रीरामजीकी आरती कर रही हैं। नगरकी शोभा,
सम्पत्ति और कल्याणका वेद, शेषजी और सरस्वती वर्णन करते हैं-।।4।।
तेउ यह चरित देखि ठगि रहहीं। उमा तासु गुन नर किमि
कहहीं।।5।।
परन्तु वे भी यह चरित्र देखकर ठगे-से रह जाते हैं (स्तम्भित
हो रहते हैं)। [शिवजी कहते हैं-] हे उमा! तब भला मनुष्य उनके गुणोंको कैसे
कह सकते हैं।।5।।
दो.-नारि कुमुदिनीं अवध सर रघुपति बिरह दिनेस।
अस्त भएँ बिगसत भईं निरखि राम राकेस।।9क।।
अस्त भएँ बिगसत भईं निरखि राम राकेस।।9क।।
स्त्रियाँ कुमुदनीं हैं, अयोध्या सरोवर है और श्रीरघुनाथजीका
विरह सूर्य है [इस विरह सूर्य के ताप से वे मुरझा गयी थीं]। अब उस विरह
रूपी सूर्य के अस्त होनेपर श्रीरामरूपी पूर्णचन्द्रको निरखकर वे खिल
उठीं।।9(क)।।
होहिं सगुन सुभ बिबिधि बिधि बाजहिं गगन निसान।
पुर नर नारि सनाथ करि भवन चले भगवान।।9ख।।
पुर नर नारि सनाथ करि भवन चले भगवान।।9ख।।
अनेक प्रकार के शुभ शकुन हो रहे हैं, आकाश में नगाड़े बज रहे
हैं। नगर के पुरुषों और स्त्रियों को सनाथ (दर्शनद्वारा कृतार्थ) करके
भगवान् श्रीरामचन्द्रजी महल को चले ।।9(ख)।।
चौ.-प्रभु जानी कैकई लजानी। प्रथम तासु गृह गए भवानी।।
ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा। पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा।।1।।
ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा। पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा।।1।।
[शिवजी कहते हैं-] हे भवानी! प्रभुने जान लिया कि माता कैकेयी
लज्जित हो गयी हैं। [इसलिये] वे पहले उन्हीं के महल को गये और उन्हें
समझा-बुझाकर बहुत सुख दिया। फिर श्रीहरि ने अपने महलको गमन किया।।1।।
कृपासिंधु जब मंदिर गए। पुर नर नारि सुखी सब भए।।
गुर बसिष्ट द्विज लिए बुलाई। आजु सुघरी सुदिन समुदाई।।2।।
गुर बसिष्ट द्विज लिए बुलाई। आजु सुघरी सुदिन समुदाई।।2।।
कृपाके समुद्र श्रीरामजी जब अपने महल को गये, तब नगरके
स्त्री-पुरुष सब सुखी हुए। गुरु वसिष्ठ जीने ब्राह्मणों को बुला लिया [और
कहा-] आज शुभ घड़ी, सुन्दर दिन आदि सभी शुभ योग हैं।।2।।
सब द्विज देहु हरषि अनुसासन। रामचंद्र बैठहिं सिंघासन।।
मुनि बसिष्ट के बचन सुहाए। सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाए।।3।।
मुनि बसिष्ट के बचन सुहाए। सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाए।।3।।
आप सब ब्राह्मण हर्षित होकर आज्ञा दीजिये, जिसमें
श्रीरामचन्द्रजी सिंहासनपर विराजमान हों। वसिष्ठ मुनिके सुहावने वचन सुनते
ही सब ब्राह्मणोंको बहुत ही अच्छे लगे।।3।।
कहहिं बचन मृदु बिप्र अनेका। जग अभिराम राम अभिषेका।।
अब मुनिबर बिलंब नहिं कीजै। महाराज कहँ तिलक करीजै।।4।।
अब मुनिबर बिलंब नहिं कीजै। महाराज कहँ तिलक करीजै।।4।।
वे सब अनेकों ब्राह्मण कोमल वचन कहने लगे कि श्रीरामजीका
राज्याभिषेक सम्पूर्ण जगत् को आनन्द देनेवाला है। हे मुनिश्रेष्ठ! अब
विलम्ब न कीजिये और महाराजका तिलक शीघ्र कीजिये।।4।।
दो.-तब मुनि कहेउ सुमंत्र सन सुनत चलेउ हरषाइ।
रथ अनेक बहु बाजि गज तुरत सँवारे जाइ।।10क।।
रथ अनेक बहु बाजि गज तुरत सँवारे जाइ।।10क।।
तब मुनिने सुमन्त्र जी से कहा, वे सुनते ही हर्षित हो चले।
उन्होंने तुरंत ही जाकर अनेकों रथ, घोड़े औऱ हाथी सजाये; ।।10(क)।।
जहँ तहँ धावन पठइ पुनि मंगल द्रब्य मगाइ।
हरष समेत बसिष्ट पद पुनि सिरु नायउ आइ।।10ख।।
हरष समेत बसिष्ट पद पुनि सिरु नायउ आइ।।10ख।।
और तहाँ-तहाँ [सूचना देनेवाले] दूतों को भेजकर मांगलिक
वस्तुएँ मँगाकर फिर हर्षके साथ आकर वसिष्ठ जी के चरणों में सिर
नवाया।।10(ख)।।
नवाह्रपारायण, आठवाँ विश्राम
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लोगों की राय
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