आरती >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (उत्तरकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (उत्तरकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। सप्तम सोपान उत्तरकाण्ड
दो.-रहा एक दिन अवधि कर अति आरत पुर लोग।
जहँ तहँ सोचहिं नारि नर कृस तन राम बियोग।।
जहँ तहँ सोचहिं नारि नर कृस तन राम बियोग।।
[श्रीरामजीके लौटने की] अवधिका एक ही दिन बाकी रह गया, अतएव
नगरके लोग बहुत आतुर (अधीर) हो रहे हैं। राम के वियोग में दुबले हुए
स्त्री-पुरुष जहाँ-तहाँ सोच (विचार) कर रहे हैं [कि क्या बात है, श्रीरामजी
क्यों नहीं आये]।
सगुन होहिं सुंदर सकल मन प्रसन्न सब केर।
प्रभु आगवन जनाव जनु नगर रम्य चहुँ फेर।।
प्रभु आगवन जनाव जनु नगर रम्य चहुँ फेर।।
इतने में ही सब सुन्दर शकुन होने लगे और सबके मन प्रसन्न हो
गये। नगर भी चारों ओर से रमणीक हो गया। मानो ये सब-के-सब चिह्न प्रभु के
[शुभ] आगमन को जना रहे हैं।
कौसल्यादि मातु सब मन अनंद अस होइ।
आयउ प्रभु श्री अनुज जुत कहन चहत अब कोई।।
आयउ प्रभु श्री अनुज जुत कहन चहत अब कोई।।
कौसल्या आदि सब माताओं के मन में ऐसा आनन्द हो रहा है जैसे अभी
कोई कहना ही चाहता है कि सीताजी और लक्ष्मणजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी आ
गये।।
भरत नयन भुज दच्छिन फरकत बारहिं बार।
जानि सगुन मन हरष अति लागे करन बिचार।।
जानि सगुन मन हरष अति लागे करन बिचार।।
भरतजी की दाहिनी आँख और दाहिनी भुजा बार-बार फड़क रही है। इसे
शुभ शकुन जानकर उनके मनमें अत्यन्त हर्ष हुआ और वे विचार करने लगे-
चौ.-रहेउ एक दिन अवधि अधारा। समुझत मन दुख भयउ अपारा।।
कारन कवन नाथ नहिं आयउ। जानि कुटिल किधौं मोहि बिसरायउ।।1।।
कारन कवन नाथ नहिं आयउ। जानि कुटिल किधौं मोहि बिसरायउ।।1।।
प्राणों की आधाररूप अवधि का एक दिन शेष रह गया! यह सोचते ही भरत
जी के मनमें अपार दुःख हुआ। क्या कारण हुआ कि नाथ नहीं आये? प्रभु ने कुटिल
जानकर मुझे कहीं भुला तो नहीं दिया?।।1।।
अहह धन्य लछिमन बड़भागी। राम पदारबिंदु अनुरागी।।
कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा। ताते नाथ संग नहिं लीन्हा।।2।।
कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा। ताते नाथ संग नहिं लीन्हा।।2।।
अहा! लक्ष्मण बड़े धन्य एवं बड़भागी हैं; जो श्रीरामचन्द्रजी के
चरणारविन्द के प्रेमी हैं (अर्थात् उनसे अलग नहीं हुए)। मुझे तो प्रभु ने
कपटी और कुटिल पहचान लिया, इसी से नाथ ने मुझे साथ नहीं लिया!।।2।।
जौं करनी समुझै प्रभु मोरी। नहिं निस्तार कलप सत कोरी।।
जन अवगुन प्रभु मान न काऊ। दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ।।3।।
जन अवगुन प्रभु मान न काऊ। दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ।।3।।
[बात भी ठीक ही है, क्योंकि] यदि प्रभु मेरी करनी पर ध्यान दें
तो सौ करोड़ (असंख्य) कल्पोंतक भी मेरा निस्तार (छुटकारा) नहीं हो सकता।
[परन्तु आशा इतनी ही है कि] प्रभु सेवक का अवगुण कभी नहीं मानते। वे दीनबन्धु
हैं और अत्यन्त ही कोमल स्वभाव के हैं।।3।।
मोरे जियँ भरोस दृढ़ सोई। मिलिहहिं राम सगुन सुभ होई।।
बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना। अधम कवन जग मोहि समाना।।4।।
बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना। अधम कवन जग मोहि समाना।।4।।
अतएव मेरे हृदय में ऐसा पक्का भरोसा है कि श्रीरामजी अवश्य
मिलेंगे [क्योंकि] मुझे शकुन बड़े शुभ हो रहे हैं। किन्तु अवधि बीत जानेपर
यदि मेरे प्राण रह गये तो जगत् में मेरे समान नीच कौन होगा?।।4।।
दो.-राम बिरह सागर महँ भरत मगन मन होत।
बिप्र रूप धरि पवनसुत आइ गयउ जनु पोत।।1क।।
बिप्र रूप धरि पवनसुत आइ गयउ जनु पोत।।1क।।
श्रीरामजी के विरह-समुद्र में भरत जी का मन डूब रहा था, उसी समय
पवन पुत्र हनुमान् जी ब्राह्मण का रूप धरकर इस प्रकार आ गये, मानो [उन्हें
डूबने से बचाने के लिये] नाव आ गयी हो।।1(क)।।
बैठे देखि कुसासन जटा मुकुट कृस गात।
राम राम रघुपति जपत स्रवत नयन जलपात।।1ख।।
राम राम रघुपति जपत स्रवत नयन जलपात।।1ख।।
हनुमान् जी ने दुर्बल शरीर भरतजी को जटाओं का मुकुट बनाये, राम
! राम! रघुपति! जपते और कमल के समान नेत्रों से [प्रेमाश्रुओंका] जल बहाते
कुश के आसन पर बैठे देखा।।1(ख)।।
चौ.-देखत हनूमान अति हरषेउ। पुलक गात लोचन जल बरषेउ।।
मन महँ बहुत भाँति सुख मानी। बोलेउ श्रवन सुधा सम बानी।।1।।
मन महँ बहुत भाँति सुख मानी। बोलेउ श्रवन सुधा सम बानी।।1।।
उन्हें देखते ही हनुमान् जी अत्यन्त हर्षित हुए। उनका शरीर
पुलकित हो गया, नेत्रोंसे [प्रेमाश्रुओंका] जल बरसने लगा। मन में बहुत प्रकार
से सुख मानकर वे कानों के लिये अमृतके समान वाणी बोले-।।1।।
जासु बिरहँ सोचहु दिन राती। रटहु निरंतर गुन गन पाँती।।
रघुकुल तिलक सुजन सुखादात। आयउ कुसल देव मुनि त्राता।।2।।
रघुकुल तिलक सुजन सुखादात। आयउ कुसल देव मुनि त्राता।।2।।
जिनके विरह में आप दिन-रात सोच करते (घुलते) रहते हैं और जिनके
गुण-समूहोंकी पंक्तियोंको आप निरन्तर रटते रहते हैं, वे ही रघुकुल के तिलक,
सज्जनों को सुख देनेवाले और देवताओं तथा मुनियों के रक्षक श्रीरामजी सकुशल आ
गये।।2।।
रिपु रन जीति सुजस सुर गावत। सीता सहित अनुज प्रभु आवत।।
सुनत बचन बिसरे सब दूखा। तृषावंत जिमि पाइ पियूषा।।3।।
सुनत बचन बिसरे सब दूखा। तृषावंत जिमि पाइ पियूषा।।3।।
शत्रु को रण में जीतकर सीताजी और लक्ष्मणजीसहित प्रभु आ रहे
हैं; देवता उनका सुन्दर यश गान कर रहे हैं। ये वचन सुनते ही [भरतजीको] सारे
दुःख भूल गये। जैसे प्यासा आदमी अमृत पाकर प्यासके दुःख को भूल जाय।।3।।
को तुम्ह तात कहाँ ते आए। मोहि परम प्रिय बचन सुनाए।।
मारुत सुत मैं कपि हनुमाना। नामु मोर सुनु कृपानिधाना।।4।
मारुत सुत मैं कपि हनुमाना। नामु मोर सुनु कृपानिधाना।।4।
[भरतजीने पूछा-] हे तात! तुम कौन हो? और कहाँ से आये हो? [जो]
तुमने मुझको [ये] परम प्रिय (अत्यन्त आनन्द देने वाले वचन सुनाये [हनुमान् जी
ने कहा-] हे कृपानिधान! सुनिये; मैं पवन का पुत्र और जाति का वानर हूँ; मेरा
नाम हनुमान् है।।4।।
दीनबंधु रघुपति कर किंकर। सुनत भरत भेंटेउ उठि सादर।।
मिलत प्रेम नहिं हृदयँ समाता। नयन स्रवत जल पुलकित गाता।।5।।
मिलत प्रेम नहिं हृदयँ समाता। नयन स्रवत जल पुलकित गाता।।5।।
मैं दीनों के बन्धु श्रीरघुनाथजी का दास हूँ। यह सुनते ही भरत
जी उठकर आदरपूर्वक हनुमान् जी से गले लगकर मिले। मिलते समय प्रेम हृदय में
नहीं समाता। नेत्रों से [आनन्द और प्रेमके आँसुओंका] जल बहने लगा और शरीर
पुलकित हो गया।।5।।
कपि तव दरस सकल दुख बीते। मिले आजु मोहि राम पिरीते।।
बार बार बूझी कुसलाता। तो कहुँ देउँ काह सुनु भ्राता।।6।।
बार बार बूझी कुसलाता। तो कहुँ देउँ काह सुनु भ्राता।।6।।
[भरतजीने कहा-] हे हनुमान्! तुम्हारे दर्शन से मेरे समस्त दुःख
समाप्त हो गये (दुःखों का अन्त हो गया)। [तुम्हारे रूपमें] आज मुझे प्यारे
राम जी मिल गये। भरतजी ने बार बार कुशल पूछी [और कहा-] हे भाई! सुनो; [इस शुभ
संवाद के बदले में] तुम्हें क्या दूँ?।।6।।
एहि संदेस सरिस जग माहीं। करि बिचार देखेउँ कछु नाहीं।।
नाहिन तात उरिन मैं तोही। अब प्रभु चरित सुनावहु मोही।।7।।
नाहिन तात उरिन मैं तोही। अब प्रभु चरित सुनावहु मोही।।7।।
इस सन्देश के समान (इसके बदल में देने लायक पदार्थ) जगत् में
कुछ भी नहीं है, मैंने यह विचार कर देख लिया है। [इसलिये] हे तात! मैं तुमसे
किसी प्रकार भी उऋण नहीं हो सकता। अब मुझे प्रभु का चरित्र (हाल) सुनाओ।।7।।
तब हनुमंत नाइ पद माथा। कहे सकल रघुपति गुन गाथा।।
कहु कपि कबहुँ कृपाल गोसाईं। सुमिरहिं मोहि दास की नाईं।।8।।
कहु कपि कबहुँ कृपाल गोसाईं। सुमिरहिं मोहि दास की नाईं।।8।।
तब हनुमान् जी ने भरत जी के चरणों में मस्तक नवाकर श्रीरघुनाथजी
की सारी गुणगाथा कही। [भरतजीने पूछा-] हे हनुमान्! कहो, कृपालु स्वामी
श्रीरामचन्द्रजी कभी मुझे अपने दास की तरह याद भी करते हैं?।।8।।
छं.-निज दास ज्यों रघुबंसभूषन कबहुँ मम सुमिरन कर्यो।
सुनि भरत बचन बिनीत अति कपि पुलकि तन चरनन्हि पर्यो।।
रघुबीर निज मुख जासु गुन गन कहत अग जग नाथ जो।
काहे न होइ बिनीत परम पुनीत सदगुन सिंधु सो।।
सुनि भरत बचन बिनीत अति कपि पुलकि तन चरनन्हि पर्यो।।
रघुबीर निज मुख जासु गुन गन कहत अग जग नाथ जो।
काहे न होइ बिनीत परम पुनीत सदगुन सिंधु सो।।
रघुवंश के भूषण श्रीरामजी क्या कभी अपने दासकी भाँति मेरा स्मरण
करते रहे हैं? भरतजी के अत्यन्त नम्र वचन सुनकर हनुमान् जी पुलकित शरीर होकर
उनके चरणोंपर गिर पड़े [और मन में विचारने लगे कि] जो चराचर के स्वामी हैं वे
श्रीरघुवीर अपने श्रीमुख से जिनके गुणसमूहों का वर्णन करते हैं, वे भरतजी ऐसे
विनम्र, परम पवित्र और सद्गुणों के समुद्र क्यों न हों?
दो.-राम प्रान प्रिय नाथ तुम्ह सत्य बचन मम तात।
पुनि पुनि मिलत भरत सुनि हरष न हृदयँ समात।।2क।।
पुनि पुनि मिलत भरत सुनि हरष न हृदयँ समात।।2क।।
[हनुमान् जी ने कहा-] हे नाथ! आप श्रीरामजी को प्राणों के समान
प्रिय हैं, हे तात! मेरा वचन सत्य है। यह सुनकर भरत जी बार-बार मिलते हैं,
हृदय में हर्ष समाता नहीं है।।2(क)।।
सो.- भरत चरन सिरु नाइ तुरित गयउ कपि राम पहिं।
कही कुसल सब जाइ हरषि चलेउ प्रभु जान चढ़ि।।2ख।।
कही कुसल सब जाइ हरषि चलेउ प्रभु जान चढ़ि।।2ख।।
फिर भरत जी के चरणों में सिर नवाकर हनुमान् जी तुरंत ही
श्रीरामजी के पास [लौट] गये और जाकर उन्होंने सब कुशल कही। तब प्रभु हर्षित
होकर विमान पर चढ़कर चले।।2(ख)।।
चौ.-हरषि भरत कोसलपुर आए। समाचार सब गुरहि सुनाए।।
पुनि मंदिर महँ बात जनाई। आवत नगर कुसल रघुराई।।1।।
पुनि मंदिर महँ बात जनाई। आवत नगर कुसल रघुराई।।1।।
इधर भरतजी हर्षित होकर अयोध्यापुरी में आये और उन्होंने गुरु जी
को सब समाचार सुनाया! फिर राजमहल में खबर जनायी कि श्रीरघुनाथजी कुशलपूर्वक
नगरको आ रहे हैं।।1।।
सुनत सकल जननीं उठि धाईं। कहि प्रभु कुसल भरत समुझाईं।।
समाचार पुरबासिन्ह पाए। नर अरु नारि हरषि सब धाए।।2।।
समाचार पुरबासिन्ह पाए। नर अरु नारि हरषि सब धाए।।2।।
खबर सुनते ही सब माताएँ उठ दौड़ीं। भरतजी ने प्रभु की कुशल कहकर
सबको समझाया। नगरवासियों ने यह समाचार पाया, तो स्त्री-पुरुष सभी हर्षित होकर
दौड़े।।2।।
दधि दुर्बा रोचन फल फूला। नव तुलसी दल मंगल मूला।।
भरि भरि हेम थार भामिनी। गावत चलिं सिंधुरगामिनी।।3।।
भरि भरि हेम थार भामिनी। गावत चलिं सिंधुरगामिनी।।3।।
[श्रीरघुनाथजी के स्वागत के लिये] दही, दूब, गोरोचन, फल, फूल और
मंगल के मूल नवीन तुलसीदल आदि वस्तुएँ सोने के थालोंमें भर-भरकर हथिनीकी-सी
चालवाली सौभाग्यवती स्त्रियाँ] उन्हें लेकर] गाती हुई चलीं।।3।।
जे जैसेहिं तैसेहिं उठि धावहिं। बाल बृद्ध कहँ संग न
लावहिं।।
एक एकन्ह कहँ बूझहिं भाई। तुम्ह देखे दयाल रघुराई।।4।।
एक एकन्ह कहँ बूझहिं भाई। तुम्ह देखे दयाल रघुराई।।4।।
जो जैसे हैं (जहाँ जिस दशामें हैं)। वे वैसे ही (वहीं उसी
दशामें) उठ दौड़ते हैं। [देर हो जाने के डर से] बालकों और बूढ़ों को कोई साथ
नहीं लाते। एक दूसरे से पूछते हैं-भाई! तुमने दयालु श्रीरघुनाथजीको देखा
है?।।4।।
अवधपुरी प्रभु आवत जानी। भई सकल सोभा कै खानी।।
बहइ सुहावन त्रिबिध समीरा। भइ सरजू अति निर्मल नीरा।।5।।
बहइ सुहावन त्रिबिध समीरा। भइ सरजू अति निर्मल नीरा।।5।।
प्रभुको आते जानकर अवधपुरी सम्पूर्ण शोभाओंकी खान हो गयी। तीनों
प्रकार की सुन्दर वायु बहने लगी। सरयूजी अति निर्मल जलवाली हो गयीं (अर्थात्
सरयूजीका जल अत्यन्त निर्मल हो गया)।।5।।
दो.-हरषित गुर परिजन अनुज भूसुर बृंद समेत।
चले भरत मन प्रेम अति सन्मुख कृपानिकेत।।3क।।
चले भरत मन प्रेम अति सन्मुख कृपानिकेत।।3क।।
गुरु वसिष्ठजी, कुटुम्बी, छोटे भाई शत्रुघ्न तथा ब्राह्मणों के
समूहके साथ हर्षित होकर भरतजी अत्यन्त प्रेमपूर्ण मन से कृपाधाम श्रीरामजीके
सामने (अर्थात् अगवानीके लिये) चले।।3(क)।।
बहुतक चढ़ी अटारिन्ह निरखहिं गगन बिमान।
देखि मधुर सुर हरषित करहिं सुमंगल गान।।3ख।।
देखि मधुर सुर हरषित करहिं सुमंगल गान।।3ख।।
बहुत-सी स्त्रियाँ अटारियों पर चढ़ी आकाशमें विमान देख रही है
और उसे देखकर हर्षित होकर मीठे स्वर से सुन्दर मंगलगीत गा रही हैं।।3(ख)।।
राका ससि रघुपति पुर सिंधु देखि हरषान।
बढ़यो कोलाहल करत जनु नारि तरंग समान।।3ग।।
बढ़यो कोलाहल करत जनु नारि तरंग समान।।3ग।।
श्रीरघुनाथजी पूर्णिमा के चन्द्रमा हैं, तथा अवधपुर समुद्र है,
जो उस पूर्णचन्द्रको देखकर हर्षित हो रहा है और शोक करता हुआ बढ़ रहा है
[इधर-उधर दौड़ती हुई] स्त्रियाँ उसी तरंगोंके समान लगती है।।3(ग)।।
चौ.-इहाँ भानुकुल कमल दिवाकर। कपिन्ह देखावत नगर मनोहर।।
सुनु कपीस अंगद लंकेसा। पावन पुरी रुचिर यह देसा।।1।।
सुनु कपीस अंगद लंकेसा। पावन पुरी रुचिर यह देसा।।1।।
यहाँ (विमान पर से) सूर्यकुलरूपी कमल के प्रफुल्लित करनेवाले
सूर्य श्रीरामजी वानरोंको मनोहर नगर दिखला रहे हैं। [वे कहते है-] हे सुग्रीव
! हे अंगद! हे लंकापति विभीषण! सुनो। यह पुरी पवित्र है और यह देश सुन्दर
है।।1।।
जद्यपि सब बैकुंठ बखाना। बेद पुरान बिदित जगु जाना।।
अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ। यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ।।2।।
अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ। यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ।।2।।
यद्यपि सबने वैकुण्ठ की बड़ाई की है-यह वेद पुराणों में
प्रसिद्ध है और जगत् जानता है, परन्तु अवधपुरीके समान मुझे वह भी प्रिय नहीं
है। यह बात (भेद) कोई-कोई (विरले ही) जानते हैं।।2।।
जन्मभूमि मम पुरी सुहावनी। उत्तर दिसि बह सरजू पावनि।।
जा मज्जन ते बिनहिं प्रयासा। मम समीप नर पावहिं बासा।।3।।
जा मज्जन ते बिनहिं प्रयासा। मम समीप नर पावहिं बासा।।3।।
यह सुहावनी पुरी मेरी जन्मभूमि है। उसके उत्तर दिशामें
[जीवोंको] पवित्र करने वाली सरयू नदी बहती है, जिसमें स्नान करने से मनुष्य
बिना ही परिश्रम मेरे समीप निवास (सामीप्य मुक्ति) पा जाते हैं।।3।।
अति प्रिय मोहि इहाँ के बासी। मम धामदा पुरी सुख रासी।।
हरषे सब कपि सुनि प्रभु बानी। धन्य अवध जो राम बखानी।।4।।
हरषे सब कपि सुनि प्रभु बानी। धन्य अवध जो राम बखानी।।4।।
यहाँ के निवासी मुझे बहुत ही प्रिय हैं। यह पुरी सुख की राशि और मेरे परमधामको देनेवाली है। प्रभुकी वाणी सुनकर सब वानर हर्षित हुए [और कहने लगे कि] जिस अवध की स्वयं श्रीरामजीने बड़ाई की, वह [अवश्य ही] धन्य है।।4।।
दो.-आवत देखि लोग सब कृपासिंधु भगवान।
नगर निकट प्रभु प्रेरेउ उतरेउ भूमि बिमान।।4क।।
नगर निकट प्रभु प्रेरेउ उतरेउ भूमि बिमान।।4क।।
कृपासागर भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने सब लोगों को आते देखा, तो
प्रभुने विमानको नगरके समीप उतरने की प्रेरणा की। तब वह पृथ्वी पर
उतरा।।4(क)।।
उतरि कहेउ प्रभु पुष्पकहि तुम्ह कुबेर पहिं जाहु।
प्रेरित राम चलेउ सो हरषु बिरहु अति ताहु।।4ख।।
प्रेरित राम चलेउ सो हरषु बिरहु अति ताहु।।4ख।।
विमान से उतरकर प्रभुने पुष्पकविमानसे कहा कि तुम अब कुबेर के
पास जाओ। श्रीरामजीकी प्रेरणा से वाहक चले। उसे, [अपने स्वमीके पास जानेका]
हर्ष है और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीसे अलग होनेका अत्यन्त दुःख भी।।4(ख)।। (विज्ञान
में रुचि रखने वाले लोग जानते हैं कि पिछले कई वर्षों से अंतर्राष्ट्रीय
मार्गों पर यात्रा करने वाले विमानों का संचालन मानवीय चालकों के द्वारा
नहीं किया जाता, बल्कि हवाई यात्रा के लिए हवा में उठने से लेकर पुनः
गंतव्य पर उतरने तथा उसके बीच की सारी हवाई यात्रा स्वचालित कम्प्यूटर के
निर्देशों से की जाती है। यहाँ तक कि अब धरती पर चलने वाली कारें भी
स्वचालित होने लगी हैं। परंतु तुलसीदास जी अपने समय में इस प्रकार की
कल्पना करके रामचरितमानस में लिखेंगे यह अचम्भित करने वाली बात है। विशेषकर
तब, जबकि तुलसी का मुख्य उद्देश्य पारमार्थिक ज्ञान को सर्व साधारण को
पहुँचाना है, न कि भौतिक साधनों और इच्छाओं की परिपूर्ति! तुलसी ने विमान
को न केवल स्वचालित कहा है, बल्कि उनके अनुसार विमान संवेदनशील भी है।)
चौ.-आए भरत संग सब लोगा। कृस तन श्रीरघुबीर बियोगा।।
बामदेव बसिष्ट मुनिनायक। देखे प्रभु महि धरि धनु सायक।।1।।
बामदेव बसिष्ट मुनिनायक। देखे प्रभु महि धरि धनु सायक।।1।।
भरतजीके साथ सब लोग आये। श्रीरघुवीरके वियोगसे सबके शरीर दुबले
हो रहे हैं। प्रभुने वामदेव, वसिष्ठ आदि मुनिश्रेष्ठोंको देखा, तो उन्होंने
धनुष-बाण पृथ्वीपर रखकर-।।1।।
धाइ धरे गुर चरन सरोरुह। अनुज सहित अति पुलक तनोरुह।।
भेंटि कुसल बूझी मुनिराया। हमरें कुसल तुम्हारिहिं दाया।।2।।
भेंटि कुसल बूझी मुनिराया। हमरें कुसल तुम्हारिहिं दाया।।2।।
छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित दौड़कर गुरु जी के चरणकमल पकड़ लिये;
उनके रोम-रोम अत्यन्त पुलकित हो गये हैं। मुनिराज वसिष्ठजी ने [उठाकर] उन्हें
गले लगाकर कुशल पूछी। [प्रभु ने कहा-] आपहीकी दयामें हमारी कुशल है।।2।।
सकल द्विजन्ह मिलि नायउ माथा। धर्म धुरंधर रघुकुलनाथा।।
गहे भरत पुनि प्रभु पद पंकज। नमत जिन्हहि सुर मुनि संकर अज।।3।।
गहे भरत पुनि प्रभु पद पंकज। नमत जिन्हहि सुर मुनि संकर अज।।3।।
धर्मकी धुरी धारण करनेवाले रघुकुलके स्वामी श्रीरामजीने सब
ब्राह्मणों से मिलकर उन्हें मस्तक नवाया। फिर भरतजीने प्रभुके चरणकमल पकड़े
जिन्हें देवता, मुनि, शंकरजी और ब्रह्मा जी [भी] नमस्कार करते हैं।।3।।
परे भूमि नहिं उठत उठाए। बर करि कृपासिंधु उर लाए।।
स्यामल गात रोम भए ठाढ़े। नव राजीव नयन जल बाढ़े।।4।।
स्यामल गात रोम भए ठाढ़े। नव राजीव नयन जल बाढ़े।।4।।
भरतजी पृथ्वी पर पड़े हैं, उठाये उठते नहीं। तब कृपासिंधु
श्रीरामजीने उन्हें जबर्दस्ती उठाकर हृदय से लगा लिया। [उनके] साँवले शरीर पर
रोएँ खड़े हो गये। नवीन कमलके समान नेत्रओंमें [प्रेमाश्रुओंके] जलकी बाढ़ आ
गयी।।4।।
छं.-राजीव लोचन स्रवत जल तन ललित पुलकावलि बनी।
अति प्रेम हृदयँ लगाइ अनुजहि मिले प्रभु त्रिभुअन धनी।।
प्रभु मिलत अनुजहि सोह मो पहिं जाति नहिं उपमा कही।
जनु प्रेम अरु सिंगार तनु धरि मिले बर सुषमा लही।।1।।
अति प्रेम हृदयँ लगाइ अनुजहि मिले प्रभु त्रिभुअन धनी।।
प्रभु मिलत अनुजहि सोह मो पहिं जाति नहिं उपमा कही।
जनु प्रेम अरु सिंगार तनु धरि मिले बर सुषमा लही।।1।।
कमलके समान नेत्रों से जल बह रहा है। सुन्दर शरीर से पुलकावली
[अत्यन्त] शोभा दे रही है। त्रिलोकी के स्वामी प्रभु श्रीरामजी छोटे भाई
भरत जी को अत्यन्त प्रेमसे हृदय से लगाकर मिले। भाई से मिलते समय प्रभु
जैसे शोभित हो रहे हैं उसकी उपमा मुझसे कही नहीं जाती। मानो प्रेम और
श्रृंगार शरीर धारण करके मिले और श्रेष्ठ शोभाको प्राप्त हुए।।1।।
बूझत कृपानिधि कुसल भरतहि बचन बेगि न आवई।
सुनु सिवा सो सुख बचन मन ते भिन्न जान जो पावई।।
अब कुसल कौसलनाथ आरत जानि जन दरसन दियो।
बूड़त बिरह बारीस कृपानिधान मोहि कर गहि लियो।।2।।
सुनु सिवा सो सुख बचन मन ते भिन्न जान जो पावई।।
अब कुसल कौसलनाथ आरत जानि जन दरसन दियो।
बूड़त बिरह बारीस कृपानिधान मोहि कर गहि लियो।।2।।
कृपानिधान श्रीरामजी भरतजी से कुशल पूछते हैं; परन्तु आनन्दवश
भरतजीके मुखसे वचन शीघ्र नहीं निकलते। [शिवजीने कहा-] हे पार्वती! सुनो, वह
सुख (जो उस समय भरतजीको मिल रहा था) वचन और मन से परे हैं; उसे वही जानता
है जो उसे पाता है। [भरतजीने कहा-] हे कोसलनाथ! आपने आर्त (दुखी) जानकर
दासको दर्शन दिये है, इससे अब कुशल है। विरहसमुद्रमें डूबते हुए मुझको
कृपानिधान हाथ पकड़कर बचा लिया!।।2।।
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लोगों की राय
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