आरती >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०-देखी ब्याधि असाध नृपु, परेउ धरनि धुनि माथ।
कहत परम आरत बचन, राम राम रघुनाथ॥३४॥
कहत परम आरत बचन, राम राम रघुनाथ॥३४॥
राजा ने देखा कि रोग असाध्य है, तब वे अत्यन्त आर्तवाणीसे 'हा
राम! हा राम! हा रघुनाथ!' कहते हुए सिर पीटकर जमीनपर गिर पड़े॥३४॥
ब्याकुल राउ सिथिल सब गाता।
करिनि कलपतरु मनहुँ निपाता॥
कंठु सूख मुख आव न बानी।
जनु पाठीनु दीन बिनु पानी॥
करिनि कलपतरु मनहुँ निपाता॥
कंठु सूख मुख आव न बानी।
जनु पाठीनु दीन बिनु पानी॥
राजा व्याकुल हो गये, उनका सारा शरीर शिथिल पड़ गया, मानो हथिनी
ने कल्पवृक्षको उखाड़ फेंका हो। कण्ठ सूख गया, मुखसे बात नहीं निकलती, मानो
पानी के बिना पहिना नामक मछली तड़प रही हो॥१॥
पुनि कह कटु कठोर कैकेई।
मनहुँ घाय महुँ माहुर देई॥
जौं अंतहुँ अस करतबु रहेऊ।
मागु मागु तुम्ह केहिं बल कहेऊ॥
मनहुँ घाय महुँ माहुर देई॥
जौं अंतहुँ अस करतबु रहेऊ।
मागु मागु तुम्ह केहिं बल कहेऊ॥
कैकेयी फिर कड़वे और कठोर वचन बोली, मानो घावमें जहर भर रही हो।
[कहती है-] जो अन्तमें ऐसा ही करना था, तो आपने 'माँग, माँग' किस बलपर कहा
था॥२॥
दुइ कि होइ एक समय भुआला।
हँसब ठठाइ फुलाउब गाला॥
दानि कहाउब अरु कृपनाई।
होइ कि खेम कुसल रौताई।
हँसब ठठाइ फुलाउब गाला॥
दानि कहाउब अरु कृपनाई।
होइ कि खेम कुसल रौताई।
हे राजा! ठहाका मारकर हँसना और गाल फुलाना-क्या ये दोनों एक साथ
हो सकते हैं? दानी भी कहाना और कंजूसी भी करना। क्या रजपूतीमें क्षेम-कुशल भी
रह सकती है? (लड़ाई में बहादुरी भी दिखावें और कहीं चोट भी न लगे!)॥ ३॥
छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू।
जनि अबला जिमि करुना करहू॥
तनु तिय तनय धामु धनु धरनी।
सत्यसंध कहुँ तृन सम बरनी॥
जनि अबला जिमि करुना करहू॥
तनु तिय तनय धामु धनु धरनी।
सत्यसंध कहुँ तृन सम बरनी॥
या तो वचन (प्रतिज्ञा) ही छोड़ दीजिये या धैर्य धारण कीजिये।
यों असहाय स्त्रीकी भाँति रोइये-पीटिये नहीं। सत्यव्रतीके लिये तो शरीर,
स्त्री, पुत्र, घर, धन और पृथ्वी-सब तिनकेके बराबर कहे गये हैं॥४॥
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- अयोध्याकाण्ड - मंगलाचरण 1
- अयोध्याकाण्ड - मंगलाचरण 2
- अयोध्याकाण्ड - मंगलाचरण 3
- अयोध्याकाण्ड - तुलसी विनय
- अयोध्याकाण्ड - अयोध्या में मंगल उत्सव
- अयोध्याकाण्ड - महाराज दशरथ के मन में राम के राज्याभिषेक का विचार
- अयोध्याकाण्ड - राज्याभिषेक की घोषणा
- अयोध्याकाण्ड - राज्याभिषेक के कार्य का शुभारम्भ
- अयोध्याकाण्ड - वशिष्ठ द्वारा राम के राज्याभिषेक की तैयारी
- अयोध्याकाण्ड - वशिष्ठ का राम को निर्देश
- अयोध्याकाण्ड - देवताओं की सरस्वती से प्रार्थना
- अयोध्याकाण्ड - सरस्वती का क्षोभ
- अयोध्याकाण्ड - मंथरा का माध्यम बनना
- अयोध्याकाण्ड - मंथरा कैकेयी संवाद
- अयोध्याकाण्ड - कैकेयी का मंथरा को झिड़कना
- अयोध्याकाण्ड - कैकेयी का मंथरा को वर
- अयोध्याकाण्ड - कैकेयी का मंथरा को समझाना
- अयोध्याकाण्ड - कैकेयी के मन में संदेह उपजना
- अयोध्याकाण्ड - कैकेयी की आशंका बढ़ना
- अयोध्याकाण्ड - मंथरा का विष बोना
- अयोध्याकाण्ड - कैकेयी का मन पलटना
- अयोध्याकाण्ड - कौशल्या पर दोष
- अयोध्याकाण्ड - कैकेयी पर स्वामिभक्ति दिखाना
- अयोध्याकाण्ड - कैकेयी का निश्चय दृढृ करवाना
- अयोध्याकाण्ड - कैकेयी की ईर्ष्या
- अयोध्याकाण्ड - दशरथ का कैकेयी को आश्वासन
- अयोध्याकाण्ड - दशरथ का वचन दोहराना
- अयोध्याकाण्ड - कैकेयी का दोनों वर माँगना
- अयोध्याकाण्ड - दशरथ का सहमना
अनुक्रम
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